
क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे महंगे मसालों में गिने जाने वाले केसर की कीमत इतनी ज्यादा क्यों होती है? दरअसल, इसकी मुख्य वजह है इसका बेहद मेहनतभरा उत्पादन. सिर्फ 1 किलो केसर तैयार करने के लिए ही करीब 1.5 से 2 लाख केसर के फूलों की जरूरत पड़ती है.

केसर के पौधे को वैज्ञानिक भाषा में क्रोकस सैटिवस नाम से जाना जाता है. इसमें बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं. इन फूलों के अंदर मौजूद लाल रंग की पतली-पतली तीन धागेनुमा संरचनाएं ही असली केसर होती हैं. इन्हीं धागों को हाथ से निकालकर सुखाया जाता है और यही बाजार में केसर के रूप में बिकता है.

सबसे खास बात यह है कि केसर की तुड़ाई पूरी तरह हाथों से की जाती है. फूल बहुत नाजुक होते हैं और इन्हें सुबह-सुबह खिलते ही तोड़ना पड़ता है, वरना उनकी गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है. इसके बाद हर फूल को खोलकर उसके अंदर से लाल धागों को सावधानी से अलग किया जाता है. यह प्रक्रिया बेहद समय लेने वाली और श्रमसाध्य होती है.

भारत में मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर के कुछ इलाकों, खासकर पंपोर क्षेत्र में केसर की खेती होती है. यहां की जलवायु और मिट्टी केसर के लिए उपयुक्त मानी जाती है, इसलिए यहां पैदा होने वाला केसर दुनिया भर में मशहूर है.

केसर की खेती में मौसम का भी बड़ा रोल होता है. अगर फूल आने के समय ज्यादा बारिश हो जाए या तापमान अचानक बदल जाए, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है. यही वजह है कि केसर का उत्पादन सीमित रहता है और इसकी कीमतें ऊंची बनी रहती हैं.

इसके अलावा, केसर के पौधे से ज्यादा मात्रा में उत्पादन नहीं मिलता. एक छोटे से खेत में भी हजारों फूल खिलते हैं, लेकिन उनसे निकलने वाला केसर वजन में बेहद कम होता है. यही कारण है कि केसर को “रेड गोल्ड” यानी लाल सोना भी कहा जाता है.

यही सब वजहें हैं कि केसर की कीमत सोने जैसी मानी जाती है. अगली बार जब आप केसर का एक छोटा सा डिब्बा देखें तो याद रखिए कि उसके पीछे लाखों फूलों और सैकड़ों-हजारों घंटों की मेहनत छिपी होती है.
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