
इस साल पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के कृष्णानगर इलाके में लीची की जबरदस्त पैदावार देखने को मिली है. यहां करीब 80 साल पुराने एक लीची के पेड़ से लगभग 500 किलो तक फल निकला है. यह आंकड़ा इसलिए भी खास है क्योंकि बिहार में आमतौर पर एक पेड़ से सिर्फ 120 से 150 किलो तक ही लीची का उत्पादन होता है.

बिहार लीची ग्रोवर एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा सिंह के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में लीची की बेहतर पैदावार के पीछे सबसे बड़ी वजह वहां के बागानों की वैज्ञानिक तरीके से की गई संरचना और पेड़ों के बीच पर्याप्त दूरी है. उनका कहना है कि लीची के पेड़ों को सही तरीके से बढ़ने के लिए खुली जगह और भरपूर धूप की जरूरत होती है, जिसका सीधा असर फलन और उत्पादन पर पड़ता है.

उन्होंने बताया कि बिहार में आमतौर पर लीची के पेड़ों के बीच 20 से 35 फीट तक की दूरी रखी जाती है. कम दूरी होने की वजह से पेड़ों की शाखाएं आपस में टकराने लगती हैं और उन्हें फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती. इसके कारण पेड़ों के अंदरूनी हिस्सों तक धूप और हवा ठीक से नहीं पहुंच पाती, जिससे फलन प्रभावित होता है.

वहीं, पश्चिम बंगाल में किसान पेड़ों के बीच करीब 40 से 60 फीट तक का अंतर रखते हैं. ज्यादा जगह मिलने से पेड़ चारों तरफ बेहतर तरीके से फैल पाते हैं. उनकी शाखाएं मजबूत होती हैं और हर हिस्से तक सूरज की रोशनी आसानी से पहुंचती है. इससे पेड़ों में बेहतर फूल आते हैं और फलों की संख्या भी काफी बढ़ जाती है.

उन्होंने यह भी बताया कि खुली जगह मिलने से पेड़ों में बीमारियों और कीटों का खतरा भी कम रहता है, क्योंकि हवा का प्रवाह बेहतर बना रहता है. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में इस बार लीची का उत्पादन उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा हुआ है.

उन्होंने बताया कि इस बार पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, जंगपुर और कृष्णा नगर समेत कई इलाकों में लीची की फसल काफी अच्छी हुई है. 5 मई से लेकर 10 जून तक इन क्षेत्रों की लीची देश के अलग-अलग राज्यों में बाजार की मांग को पूरा कर रही है.

पश्चिम बंगाल में अच्छी पैदावार का असर बाजार पर भी देखने को मिल रहा है. बिहार में इस बार लीची का उत्पादन अपेक्षाकृत कम है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में कीमतों में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है. इसकी बड़ी वजह यही है कि पश्चिम बंगाल से बड़ी मात्रा में लीची की सप्लाई लगातार बनी हुई है, जिससे बाजार में संतुलन बना हुआ है.
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