दो किसानों ने की आत्महत्यामहाराष्ट्र के मराठवाड़ा में सूखे की मार से किसानों की परेशानी बढ़ती जा रही है. कई इलाकों में सोयाबीन की फसल बर्बाद होने की खबरें हैं. लातूर और धाराशिव में दो किसानों की आत्महत्या का मामला सामने आया है. दोनों किसानों के परिवारों का कहना है कि सूखे के कारण फसल बर्बाद हो गई थी और कर्ज चुकाने की चिंता भी बढ़ गई थी, जिसके कारण दोनों किसानों ने आत्महत्या की है. हालांकि, मौत के कारणों की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी.
लातूर जिले की अहमदपुर तहसील के देवकरा गांव के 60 वर्षीय किसान तुकाराम निवृत्ति गुट्टे की मौत हो गई. परिवार का आरोप है कि सूखे के कारण उनकी करीब डेढ़ एकड़ जमीन में लगी सोयाबीन की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी. इसके बाद वह बैंक का कर्ज चुकाने और परिवार का खर्च चलाने को लेकर परेशान थे.
तुकाराम के भतीजे सोमेश्वर गुट्टे के मुताबिक, घटना से करीब दो दिन पहले उनकी तुकाराम से बातचीत हुई थी. उस समय तुकाराम ने फसल बर्बाद होने और बैंक कर्ज को लेकर चिंता जताई थी. परिवार के अनुसार, उन्हें उम्मीद थी कि इस साल सोयाबीन की उपज बेचकर बैंक का कर्ज चुका देंगे. लेकिन फसल खराब होने के बाद उनके सामने कर्ज चुकाने का संकट खड़ा हो गया.परिवार का कहना है कि तुकाराम इस बात को लेकर भी परेशान थे कि कर्ज चुकाने के बाद घर का खर्च कैसे चलेगा. इसी वजह से किसान ने अपने ही खेत में खुद को पेड़ से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.
दूसरा मामला धाराशिव जिले के खानापुर गांव का है. यहां 35 वर्षीय किसान दयानंद राठोड की मौत हो गई. परिवार के मुताबिक, दयानंद के पास करीब चार एकड़ जमीन थी और उन्होंने इस साल सोयाबीन की खेती की थी. खेती के साथ वह गन्ना कटाई का काम भी करते थे. रिपोर्टों के अनुसार, दयानंद खेत में सोयाबीन की स्थिति देखने गए थे. परिवार का कहना है कि फसल की हालत देखकर उन्हें पता चला कि इस बार अपेक्षित उत्पादन नहीं होगा. सूखे के कारण सोयाबीन की फसल को नुकसान हुआ था. इसके बाद फसल से आमदनी नहीं होने और कर्ज चुकाने की चिंता के बीच उन्होंने यह कदम उठाया. दयानंद के परिवार में पत्नी, एक बेटा और एक बेटी हैं. परिजनों ने सरकार से परिवार को तत्काल आर्थिक मदद देने और बच्चों के भविष्य के लिए सहायता की मांग की है.
दयानंद राठोड की मौत के बाद उनके परिजन शव को धाराशिव जिलाधिकारी कार्यालय के सामने लेकर पहुंचे. परिजनों ने आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग की. रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान परिवार और अन्य लोगों ने कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया. परिवार का कहना है कि जब खेत में फसल नहीं हुई और कर्ज चुकाने का रास्ता नहीं बचा, तो घर चलाना मुश्किल हो गया. उनका सवाल है कि अगर फसल नुकसान के बाद सरकारी मदद मिलनी है, तो वह समय पर किसानों तक क्यों नहीं पहुंच रही.
मराठवाड़ा में इस साल बारिश की कमी का असर खरीफ फसलों पर पड़ा है. एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, मराठवाड़ा में बारिश की कमी करीब 38 फीसदी रही है और सोयाबीन का उत्पादन सामान्य से केवल 40 से 50 फीसदी रहने का अनुमान है. लातूर समेत कई जिलों में बारिश की कमी से फसल पर गंभीर असर पड़ा है. ऐसे में किसानों के सामने सिर्फ फसल बचाने की चुनौती नहीं है. बीज, खाद और खेती पर किया गया खर्च भी वापस निकालना मुश्किल हो रहा है. जिन किसानों ने खेती के लिए कर्ज लिया है, उनके सामने फसल खराब होने के बाद कर्ज चुकाने की चिंता और बढ़ गई है. (गणेश सुभाष जाधव और अनिकेत अंकुश जाधव की रिपोर्ट)
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