मिट्टी के बर्तन की बढ़ी मांग मिट्टी के बर्तन स्वास्थ्य के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद माने जाते हैं. समय के साथ साथ मिट्टी के बर्तनों का उपयोग अब तेजी से बढ़ने लगा है. कोरोना काल के पहले तक प्लास्टिक के डिस्पोजल बर्तनों के उपयोग में काफी ज्यादा वृद्धि हुई थी, जिसके चलते कुम्हार की रोजी-रोटी पर संकट मंडराने लगा था, लेकिन अब खानपान में तेजी से मिट्टी के बर्तनों का उपयोग बढ़ा है. जिसके चलते अब कुम्हारों का रोजगार मुख्यधारा में लौटने लगा है. उत्तर प्रदेश के वाराणसी में भी इन दिनों कुम्हार काफी खुश है क्योंकि चाय की दुकानों से लेकर बड़े होटल और शादी-ब्याह की पंडालों में मिट्टी के बर्तनों की मांग खूब हो रही है, जिसके चलते उनकी आय में अब तेजी से इजाफा हो रहा है.
चाय के शौकीन इन दिनों बाजार में मिट्टी के कुल्हड़ में चाय को पीना पसंद कर रहे हैं, जिसके चलते दुकानदारों को भी बड़ी संख्या में मिट्टी के कुल्हड़ को खरीदना पड़ रहा है. पिछले 2 सालों में मिट्टी के कुल्हड़ की मांग में 4 से 5 गुना का इजाफा देखने को मिल रहा है. चाय के दुकानदार खुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि अब ग्राहक डिस्पोजल कप में चाय पीना नहीं पसंद करता है बल्कि वह कुल्लड़ में ही चाय की मांग करता है. चाय पीने वाले ग्राहक राजेश कुमार ने बताया कि मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीने से स्वाद काफी बढ़ जाता है. इसी वजह से उन्हें कुल्हड़ में चाय पीना अच्छा लगता है. वाराणसी में बड़ी संख्या में चाय की दुकानें हैं, जहां प्रतिदिन 4 से लेकर 5 लाख कुल्हड़ की खपत हो रही है.
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वाराणसी के सथवा गांव की शकुंतला एकमात्र महिला कुम्हार हैं, जो आज भी चौक से बर्तन बनाने का काम करती है. हालांकि महिलाएं इस काम को करने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाती हैं. फिर भी शकुंतला बिना किसी शर्म के इस काम को शौक से करती है. शकुंतला ने किसान तक को बताया कि वह प्रतिदिन 1000 से लेकर डेढ़ हजार मिट्टी के कुल्हड़ बना लेती हैं. घर का सारा काम करने के बावजूद वह इस काम को करती हैं. इससे उन्हें आर्थिक मदद मिलती है और घर के खर्चों में उनका योगदान भी होता है.वाराणसी में मोदी के सांसद बनने के बाद मिट्टी के कुल्हड़ की खपत बढ़ी है, जिसके चलते बाजार की मांग से उनकी आमदनी में भी इजाफा हो रहा है. वह प्रतिदिन 500 से लेकर ₹700 तक कमा लेती हैं.
शहर से लेकर गांव में भी अब कुम्हारों को मिट्टी के बर्तनों को बनाने के लिए खूब ज्यादा आर्डर मिल रहे हैं. वहीं बाजार में अब बर्तनों के भाव भी पहले के मुकाबले 1.5 से 2 गुना तक बढ़ गए हैं, जिससे कुम्हारों का फायदा बढ़ा है. बाजार में जहां पहले 20 में 100 रुपये कुल्हड़ बिक रहे थे. अब 50 रुपये तक कीमत जा पहुंची है. यही मिट्टी के दीयों की कीमत भी अब 30 से 40 रुपये हो गई है. इस वजह से कुम्हार के चाक की रफ्तार और तेज हो गई है.
मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से आयरन, फास्फोरस, कैल्शियम ,मैग्नीशियम की मात्रा नष्ट नहीं होती है, जो शरीर के लिए फायदेमंद होता है. मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने और खाने से पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं. वही भोजन स्वादिष्ट बनता है. इसके अलावा अपच और गैस संबंधी समस्या नहीं होती है. भोजन का पीएच वैल्यू बना रहता है.
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