चारे की तलाश में जाता गायों का रेवड़. फोटो क्रेडिट-किसान तक बाईपास-हाइवे और गांव की सड़कों पर आपने गाय, भेड़-बकरी के झुंड तो देखे ही होंगे. राजस्थान में जानवरों के ऐसे झुंड को रेवड़ कहा जाता है. फिर तो आपने रेवड़ के साथ-साथ लाल पगड़ी में चलने वाले चरवाहे भी देखे होंगे. ये देवासी समाज होता है जो चारे-पानी की कमी के चलते अपने पशुओं को लेकर छह से आठ महीने के लिए दूसरे राज्यों और शहरों में निकल जाते हैं. इस दौरान सड़क और खेत ही इनका घर-बहार होता है और यही से पशुओं का कारोबार चलता है. ये दूध की चलती-फिरती डेयरी भी कही जाती हैं. समाज में कोई शादी-ब्याह होने या फिर और किसी काम के चलते बीच-बीच में घर का चक्कर लग जाए तो अलग बात है.
गाय, भेड़-बकरियों के रेवड़ लेकर घूमने वाले देवासी समाज की गर्मी और बरसात सड़क और उसके किनारे खेतों में ही गुजरती है. इस तरह से अपनी गुजर-बसर करने वाले ये कोई 10-20 हजार लोग नहीं हैं, लाखों की संख्या वाला इनका अपना एक पूरा देवासी समाज है. इनका कारोबार पशुपालन है. ये समुदाय मुख्य तौर पर राजस्थान का रहने वाला है.
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पाली, राजस्थान के रहने वाले एक अन्य पशुपालक बाघाराम ने किसान तक से बातचीत में बताया कि फरवरी-मार्च में हम अपने घर से निकल आते हैं. क्योंकि यहीं से हमारे गांवों में हरे चारे और पानी की कमी शुरू हो जाती है. गायों का चारा और पानी लगातार मिलते रहे इसलिए हरियाणा में दाखिल हो जाते हैं. क्योंकि इन्हीं पशुओं से हमारा भी पेट भरता है तो इसलिए ऐसा करना और भी जरूरी हो जाता है. महेन्द्रगढ़ बार्डर के रास्ते हरियाणा में दाखिल हो जाते हैं. फिर रेवाड़ी और मानेसर, गुड़गांव, होते हुए करनाल की तरफ निकल जाते हैं. तब तक सितम्बर-अक्टू बर आ जाता है. ये वो महीना होता है जब हमारे समाज के पशुपालक गांवों की ओर लौटना शुरू कर देते हैं.
150 से 200 गायों के एक झुंड को रेवड़ कहा जाता है. ऐसे ही एक रेवड़ को हांकने वाले पशुपालक हरीश ने किसान तक को बताया कि दो लोग मिलकर एक रेवड़ को संभालते हैं. किसी भी एक शहर में 10 से 12 रेवड़ होते हैं. हर एक शहर में ऐसे ही रहते हैं. सभी एक जगह जमा नहीं होते हैं. वर्ना तो पशुओं को चारे की कमी हो जाएगी. सड़क पर चलते वक्त गायों को सभालना मुश्किल काम होता है.
क्योंकि सड़क पर चलने वाले वाहनों को कोई परेशानी न हो इसका ख्याल रखना पड़ता है. हालांकि कई बार हमे गालियों का भी सामना करना पड़ता है, लेकिन मजबूरी है क्या करें. एक गांव में हम दो से तीन दिन तक रुकते हैं. हालांकि ये इस बात पर भी निर्भर करता है कि वहां हरा चारा कितना है. इसी हिसाब से हम धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ते रहते हैं.
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राजस्थान के ये पशुपालक कांकरेज गाय पालते हैं. हालांकि ये नस्ल मूल रूप से गुजरात की है, लेकिन राजस्थानन में भी बड़े पैमाने पर इसका पालन होता है. इसकी दो सबसे बड़ी पहचान ये हैं कि एक तो इसके सींग बड़े और मोटे होते हैं. दूसरा ये कि इस नस्ल की गाय का शरीर आम देसी गाय के मुकाबले बहुत बड़ा और भारी-भरकम होता है. ऐसा मान लें कि देसी गाय में जो सांड होते हैं, ऐसे ही शरीर की कांकरेज गाय होती है. ये दिनभर में अधिकतम पांच लीटर तक दूध देती है. ये रफ एंड टफ नस्ल की गाय है तो हर मौसम को बड़ी ही आसानी से झेल जाती है. जल्द ही बीमार भी नहीं पड़ती है.
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