खाद संकटपश्चिमी एशिया के अशांत हालातों, विशेष रूप से ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच लड़ाई ने भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती पेश कर दी है. हमारा देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 40 प्रतिशत यूरिया और फास्फेटिक उर्वरक इन्हीं खाड़ी और पश्चिमी एशियाई देशों से आयात करता है. युद्ध की आहट और समुद्री मार्गों में संभावित बाधाओं के कारण खाद की आपूर्ति रुकने का गहरा डर पैदा हो गया है. इसी आशंका का फायदा उठाते हुए बाजार में खाद की कालाबाजारी और जमाखोरी की खबरें तेज हो गई हैं. मार्च का महीना, जो आमतौर पर खेती के लिहाज से काफी शांत माना जाता है, उसमें खाद की बिक्री में अचानक आई भारी तेजी ने सरकार के कान खड़े कर दिए हैं.
इसे देखते हुए भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने 31 मार्च को राज्यों के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं कि अवैध तस्करी और जमाखोरी करने वालों पर तुरंत नकेल कसी जाए. सरकार का कहना है कि असली चुनौती सिर्फ सप्लाई नहीं, बल्कि हमारी मिट्टी की बिगड़ती सेहत है, जो यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल से 'नशेड़ी' हो चुकी है.
विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों में यूरिया का इस्तेमाल जरूरत से कहीं ज्यादा हो रहा है. किसानों में यह गलतफहमी घर कर गई है कि जितना ज्यादा यूरिया डालेंगे, फसल उतनी ही हरी-भरी होगी. हकीकत यह है कि इस होड़ में हमने मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति को खत्म कर दिया है. वैज्ञानिक पैमाना कहता है कि खाद का आदर्श अनुपात 4:2:1 नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश होना चाहिए, लेकिन आज यह संतुलन बिगड़कर 9.3 : 3.5 : 1 के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है और यूरिया जरूरत से दोगुना अधिक खेतों में डाल रहे हैं, जिससे मिट्टी का 'ऑर्गेनिक कार्बन' खत्म हो रहा है. अगर यही हाल रहा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ बंजर जमीन ही बचेगी.
मिट्टी की खोई हुई जान वापस लौटाने के लिए 'ढैंचा' या 'सनई' अजोला जैसी हरी खाद किसी संजीवनी से कम नहीं है. आईसीएआर- आरसीएआर पटना के भूमि और जल प्रबंधन के प्रमुख डॉ आशुतोष उपाध्याय का मानना है कि धान की रोपाई से पहले अगर खेत में ढैंचा उगाकर उसे वहीं जोत दिया जाए, तो यह मिट्टी को कुदरती ताकत देता है. ढैंचा की जड़ें हवा से नाइट्रोजन खींचकर जमीन में जमा करती हैं. अगर किसान सही समय पर अच्छी क्वालिटी के ढैंचा बीजों का इस्तेमाल करेंं, तो रासायनिक खाद की जरूरत 50 फीसदी तक कम की जा सकती है. यह न केवल सस्ता है, बल्कि मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता को भी बढ़ा देता है, जिससे सूखा पड़ने पर भी फसल सुरक्षित रहती है.
डॉ आशुतोष उपाध्याय का कहना है जैसे पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर विदेशों पर तेल की निर्भरता कम की है, वैसा ही मॉडल हमें खेती में अपनाना होगा. इसी तरह खेती में भी बायोफर्टिलाइर जैविक खाद और फसल के अवशेष का प्रयोग करने आदत डालकर समृद्धि' का रास्ता तय कर सकते है. इसके लिए सरकार को लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए कि आने वाले वर्षों में कम से कम 50 फीसदी रासायनिक खादों की जगह जैविक और बायो-फर्टिलाइजर और फसल के अवशेष का उपयोग हो और इसके लिए रोडमैप तैयार करने की जरूरत है. जब किसान अपनी आंखों से देखेगा कि जैविक खाद से अनाज की चमक और स्वाद बढ़ रहा है, तो वह खुद ही यूरिया ज्यादा प्रयोग करना छोड़ देगा. इससे 'एक तीर से दो निशाने' लगेंगे-प्रदूषण भी रुकेगा और देश का अरबों रुपयों का खाद आयात बिल भी कम होगा.
डॉ आशुतोष उपाध्याय और फर्टिलाइजर विशेषज्ञो का कहना है कि पुरानी पद्धति में हम यूरिया या डीएपी की बोरियां भर-भर के खेत में छिड़क देते हैं, लेकिन उसका सिर्फ 30-40 फीसदी हिस्सा ही पौधों को मिल पाता है, बाकी खेतों में बर्बाद होकर जमीन और पानी को जहरीला बनाता है. इसके मुकाबले 'वॉटर सॉल्यूबल फर्टिलाइजर' यानी पानी में घुलनशील खादका असर बहुत शानदार है. इसे पौधे 85 फीसदी तक सीधे सोख लेते हैं. अगर किसान ड्रिप सिंचाई के साथ 'फर्टिगेशन' पानी के साथ खाद देना अपनाएं, तो खाद की लागत आधी हो जाएगी और पैदावार डेढ़ गुना तक बढ़ सकती है. मिट्टी को भी 17 पोषक तत्वों की जरूरत होती है. हमें मिट्टी की जांच करवाकर ही खाद डालनी चाहिए. विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन हम सिर्फ नाइट्रोजन के लिए यूरिया पर जोर देते हैं.
खेती को बचाने के लिए सिर्फ किसान का पसीना काफी नहीं है, सरकारी तंत्र की नीयत और नीति दोनों का साफ होना जरूरी है. अक्सर किसानों की शिकायत रहती है कि ढैंचा के बीज या जैविक खाद पर मिलने वाली सब्सिडी और सुविधाएं उन्हें समय पर नहीं मिलतीं. जब किसान को सरकारी मदद नहीं मिलती, तो वह मजबूरन बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदता है. बदलाव तभी आएगा जब राज्य सरकारों के कृषि विभागो यह सुनिश्चित करेगे कि अच्छी क्वालिटी का जैविक उर्वरक, बायोमास खाद, कम्पोस्ट खाद का जैविक विकल्प ठीक समय पर किसानों तक पहुंचें.
साथ ही साथ के कृषि विभागों को दफ्तरों से निकलकर खेतों तक पहुंचना होगा, और किसानों को जागरूक करने के लिए काम करना होगा और रिजल्ट भी दिखाना होगा. इसके साथ कृषि विज्ञान केंद्रों' (KVK) और 'आत्मा' (ATMA) जैसी संस्थाओं को इस पर विशेष जोर देना होगा. जब किसान को सही सलाह और सही समय पर विकल्प मिलेगा, तभी हमारी मिट्टी का 'नशा' उतरेगा और देश खाद के आयात से मुक्त होगा.
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