Success Story: बेकार गोबर से लाखों कमाने का फार्मूला, असम के किसान ने बनाई नायाब मशीन, घर बैठे शुरू करें बिजनेस

Success Story: बेकार गोबर से लाखों कमाने का फार्मूला, असम के किसान ने बनाई नायाब मशीन, घर बैठे शुरू करें बिजनेस

आज गांवों में एक बड़ी समस्या यह है कि जब गाय दूध देना बंद कर देती है, तो लोग उसे लावारिस छोड़ देते हैं. इससे सड़कों पर परेशानी बढ़ती है और गोबर भी बेकार पड़ा रहता है. असम के मिलन ज्योति दास ने इस समस्या का शानदार हल निकाला है. उन्होंने साबित कर दिया कि गाय का गोबर भी 'सोना' है, जिससे दूध न देने वाली गाय भी कमाई का जरिया बन सकती है. मिलन ने मात्र ₹1500 की लागत से एक ऐसी मशीन बनाई है, जो बेकार गोबर और खेती के कचरे को कीमती नर्सरी गमलों में बदल देती है.

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बेकार गोबर से लाखों कमाने का फार्मूला, असम के किसान ने बनाई नायाब मशीन, घर बैठे शुरू होगा बिजनेसअसम के मिलन ज्योति दास ने बनाई गोबर से गमले बनाने वाली मशीन

गांवों में गाय के गोबर को अक्सर सिर्फ खाद या उपले बनाने तक सीमित रखा जाता है और खेती से निकलने वाला कचरा जैसे पुआल या भूसा या तो जला दिया जाता है या बेकार पड़ा रहता है. दूसरी तरफ, नर्सरी और बागवानी में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के छोटे गमले और थैलियां पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुकी हैं. ये प्लास्टिक कभी गलता नहीं और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को खत्म कर देता है. असम के कामरूप जिले के रहने वाले 45 वर्षीय मिलन ज्योति पिछले 14 सालों से खेती-किसानी से जुड़े हैं, मिलन ज्योति ने इसी समस्या को एक अवसर में बदला. उन्होंने सोचा कि क्यों न गोबर और कृषि अवशेषों का इस्तेमाल करके कुछ ऐसा बनाया जाए जो प्लास्टिक की जगह ले सके. इसी सोच के साथ उन्होंने एक ऐसी मशीन बनाई जो गोबर से सुंदर और मजबूत गमले तैयार करती है. उनकी यह छोटी सी शुरुआत आज प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ी जंग बन गई है,  उनकी इस नई सोच से बनी जिसने कचरे को कमाई के जरिए में बदल दिया. 

गोबर से लाखों कमाई वाली मशीन

मिलन ज्योति ने अपनी तकनीक को इतना सरल रखा है कि इसे कोई भी आम व्यक्ति अपना सकता है. उन्होंने एक 'मैनुअल स्क्रू-टाइप प्रेस मशीन' का निर्माण किया है. इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बनाने में मात्र 1500 रुपये का खर्च आता है. इसमें किसी भी तरह की बिजली या ईंधन की जरूरत नहीं पड़ती, यानी इसे चलाने का खर्चा शून्य है. मशीन को चलाने के लिए हाथ से एक पहिया या हैंडल घुमाना होता है, जिससे प्रेशर बनता है. इस मशीन के जरिए गाय के गोबर में प्राकृतिक चीजें जैसे धान की भूसी और रद्दी कागज की लुगदी मिलाकर एक गाढ़ा मिश्रण तैयार किया जाता है. जब इस मिश्रण को मशीन के सांचे में डालकर दबाया जाता है, तो वह एक शानदार 'बायो-पॉट' या नर्सरी कप का रूप ले लेता है. एक व्यक्ति इस मशीन से दिनभर में 50 से लेकर 150 तक गमले आराम से बना सकता है. यह मशीन लोहे की बनी है और इस पर जंग से बचने के लिए खास कोटिंग की गई है, जिससे यह सालों-साल चलती है.

प्लास्टिक की छुट्टी, पौधों की उन्नति

आमतौर पर जब हम नर्सरी से प्लास्टिक की थैली में पौधा लाते हैं, तो उसे खेत में लगाते समय प्लास्टिक फाड़कर फेंकना पड़ता है. इस प्रक्रिया में अक्सर पौधे की नाजुक जड़ें टूट जाती हैं, जिसे 'ट्रांसप्लांटिंग स्ट्रेस' कहते हैं. इसकी वजह से कई बार पौधा सूख जाता है. लेकिन मिलन के बनाए गोबर के गमलों की बात ही अलग है. इन गमलों को पौधे समेत ही जमीन में गाड़ दिया जाता है. चूंकि ये पूरी तरह प्राकृतिक हैं, इसलिए मिट्टी के अंदर जाते ही ये गलना शुरू कर देते हैं और पौधे की जड़ों के लिए खाद का काम करते हैं. इससे जड़ों को कोई नुकसान नहीं होता और पौधे को अतिरिक्त पोषण मिलता है जिससे वह तेजी से बढ़ता है. इन गमलों को बनाने के बाद 1-2 दिन धूप में सुखाया जाता है, जिसके बाद इनकी मजबूती इतनी बढ़ जाती है कि इन्हें 3 महीने तक आसानी से स्टोर करके रखा जा सकता है.

सस्ती मशीन से घर बैठे करें बिजनेस

आज जब पूरी दुनिया 'सिंगल यूज प्लास्टिक' को खत्म करने की बात कर रही है, तब मिलन का यह मॉडल हर गांव में रोजगार पैदा कर सकता है. आर्थिक नजरिए से देखें तो यह बहुत फायदेमंद है. जहां मशीन सिर्फ 1500 रुपये में बन जाती है, वहीं एक गोबर के गमले को बाजार में 20 रुपये तक में बेचा जा सकता है. अगर एक किसान दिन में 100 गमले भी बनाता है, तो वह अच्छी-खासी कमाई कर सकता है. शहरों में घरों के अंदर बागवानी करने वाले लोग ऐसे ऑर्गेनिक गमलों को हाथों-हाथ लेते हैं. यह तकनीक न केवल कचरे का निपटारा करती है, बल्कि रसायनों से मुक्त खेती को भी बढ़ावा देती है, क्योंकि इसमें किसी भी तरह के हानिकारक केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है.

असम के मिलन ज्योति की बड़ी सोच

मिलन ज्योति दास की इस खोज ने यह साबित कर दिया है कि नई सोच के लिए बड़ी डिग्रियों की नहीं, बल्कि समाज के प्रति सच्ची लगन की जरूरत होती है. हालांकि यह मशीन अभी हाथ से चलाई जाती है, लेकिन अब इसे और आधुनिक बनाने की जरूरत है ताकि उत्पादन को कई गुना बढ़ाया जा सके. मिलन का सपना है कि उनकी यह मशीन देश के हर उस किसान तक पहुंचे जिसके पास पशुधन है. उनका यह प्रयास हमें सिखाता है कि अगर हम प्रकृति के साथ मिलकर चलें, तो हम न केवल अपना जीवन सुधार सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक साफ-सुथरी धरती भी दे सकते हैं. 

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