सिट्रोनेला यानी लेमन ग्रास की नई वैरायटी तैयारसिट्रोनेला जिसे हम आम भाषा में 'नींबू घास' की एक प्रजाति के रूप में भी जानते हैं, सुगंधित तेल और मच्छर भगाने वाले उत्पादों के लिए दुनिया भर में मशहूर है. हाल ही में लखनऊ स्थित सीएसआईआर-सीमैप के वैज्ञानिकों ने इसकी एक बेहतरीन किस्म विकसित की है, जिसे सीआईएम-हरितिमा नाम दिया गया है. यह किस्म उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की जलवायु को ध्यान में रखकर तैयार की गई है. वैज्ञानिकों ने 'सोमाक्लोनल' विधि से एक उन्नत वैज्ञानिक प्रक्रिया का उपयोग करके पुरानी बायो किस्म में सुधार किया और 150 से अधिक पौधों के परीक्षण के बाद इस नई किस्म को चुना.
यह पौधा न केवल देखने में लंबा और घना है, बल्कि इसकी विकास क्षमता भी पिछली किस्मों से कहीं अधिक है. यह किस्म उन किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है जो पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती में रुचि रखते हैं.
किसान के लिए सबसे जरूरी चीज होती है 'पैदावार'. सीआईएम-हरितिमा इस मामले में सबको पीछे छोड़ देती है. रिपोर्ट के अनुसार, इसकी ताजी घास की पैदावार प्रति हेक्टेयर लगभग 650 से 719 क्विंटल तक हो सकती है. दो कटाइयों में अगर हम तेल की बात करें, तो इससे साल भर में 333 से 365 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सुगंधित तेल प्राप्त किया जा सकता है.
यह तेल न केवल मात्रा में अधिक है, बल्कि गुणवत्ता में भी लाजवाब है. इसमें सिट्रोनेलोल की मात्रा 38-40 फीसदी तक पाई जाती है, जो कि इसकी मुख्य सुगंधित सामग्री है. इसके अलावा इसमें गेरानियोल 15-19 फीसद और सिट्रोनेलोल 9-11 फीसद का भी सही मिश्रण होता है. यह तेल अंतरराष्ट्रीय मानकों (ISO 3848:2016) पर खरा उतरता है, जिससे इसकी मांग परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स और घरेलू क्लीनर बनाने वाली कंपनियों में बहुत ज्यादा रहती है.
सीमैप लखनऊ के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी शारीरिक बनावट और मजबूती है. इसके पौधे काफी ऊंचे और घने होते हैं, जिससे खेत में हरियाली का एक बड़ा गुच्छा सा नजर आता है. इसकी पत्तियां लंबी, संकरी और गहरे हरे रंग की होती हैं, जिनकी चौड़ाई सामान्य सिट्रोनेला से अधिक होती है. जब आप इन पत्तियों को रगड़ते हैं, तो इनसे बहुत ही तीखी और मनमोहक खुशबू आती है. खेती के नजरिए से देखा जाए तो इसकी रोपाई कल्ले के जरिए की जाती है.
सबसे अच्छी बात यह है कि इस किस्म की स्थापना दर (Establishment Rate') 95-98 फीसद है, जिसका मतलब है कि अगर आप 100 पौधे लगाते हैं, तो उनमें से लगभग सभी सुरक्षित तरीके से जड़ पकड़ लेते हैं और सूखते नहीं हैं. यह विशेषता किसानों के जोखिम को कम करती है और शुरुआती लागत की सुरक्षा सुनिश्चित करती है.
सीमैप के अनुसार, खेती में अक्सर कीटों और बीमारियों का डर रहता है, लेकिन 'सीआईएम हरितिमा इस मामले में काफी भरोसेमंद है. इसे उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा की मिट्टी और मौसम के हिसाब से ढाला गया है. परीक्षणों के दौरान पाया गया कि इस किस्म में प्रमुख बीमारियों और कीटों का असर बहुत कम होता है. इसके अलावा, इसकी दुबारा उगने की क्षमता यानी कटाई के बाद फिर से तेजी से बढ़ने की शक्ति बहुत शानदार है.
एक बार कटाई करने के बाद पौधा बहुत जल्दी फिर से तैयार हो जाता है, जिससे किसान साल में कई बार फसल ले सकते हैं. इसकी यही स्थिरता और मजबूती इसे एक 'लो-मेंटेनेंस' यानी कम देखभाल वाली फसल बनाती है, जो प्रतिकूल मौसम में भी डटी रहती है.
आज के समय में जब किसान पारंपरिक फसलों से हटकर औषधि फसलों जैसे कि सिट्रोनेला की खेती करना चाहते हैं, तो 'सीआइईम 'हरितिमा' एक बेहतर विकल्प है. सिट्रोनेला का उपयोग मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती, स्प्रे, क्रीम और साबुन बनाने में बड़े पैमाने पर होता है क्योंकि यह किस्म तेल की बहुत अच्छी मात्रा 0.48 फीसद से 0.53 फीसद तक देती है, इसलिए तेल निकालने वाली इकाइयां भी इसे पसंद करती हैं.
किसानों के लिए यह किस्म कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली किस्म है. इसकी खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में मदद करती है, बल्कि यह उन इलाकों के लिए भी उपयुक्त है जहां पानी की उपलब्धता सीमित है. अपनी उच्च पैदावार, बेहतरीन तेल गुणवत्ता और बीमारियों के प्रति सहनशीलता के कारण, सीआईएम हरितिमा उत्तर भारत के किसानों की आय बढ़ाने में बेहद कारगर हो सकती है.
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