Potato Production: आलू की पैदावार 40 गुना बढ़ी पर कमाई वहीं की वहीं, क्या गुजरात के ग्लोबल मॉडल से ही मिलेगा सही रेट?

Potato Production: आलू की पैदावार 40 गुना बढ़ी पर कमाई वहीं की वहीं, क्या गुजरात के ग्लोबल मॉडल से ही मिलेगा सही रेट?

देश में आजादी के बाद से आलू की पैदावार तो 40 गुना बढ़ गई, लेकिन आज भी किसानों को सही दाम के लिए तरसना पड़ता है. बंपर फसल होने पर मंडियों में रेट गिर जाते हैं, जिससे किसान की मेहनत का वाजिब फल नहीं मिल पाता. इस समस्या का समाधान 'गुजरात मॉडल' में छिपा है, जहां किसान सीधे प्रोसेसिंग कंपनियों के साथ जुड़कर बुवाई के वक्त ही पक्का दाम तय कर लेते हैं. अब दूसरे राज्यों के किसानों को भी अपनी चाल बदलनी होगी और आलू को सिर्फ थाली की सब्जी न मानकर एक 'ग्लोबल इंडस्ट्री' के रूप में देखना होगा.

Advertisement
आलू की पैदावार 40 गुना बढ़ी पर कमाई वहीं की वहीं, क्या गुजरात के ग्लोबल मॉडल से ही मिलेगा सही रेट? मौसमी ताकत होने के बाद भी आलू में बहुत पीछे है भारत

पिछले 75 सालों में भारत ने आलू की पैदावार में रिकॉर्ड तोड़ तरक्की की है. साल 1949 में हम जहां सिर्फ 15 लाख टन आलू उगाते थे, आज वह बढ़कर 600 लाख टन के पार पहुंच गया है. इस बड़ी कामयाबी ने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश बना दिया है. लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जब भी बंपर पैदावार होती है, बाज़ार में आलू के दाम मिट्टी में मिल जाते हैं. आज भी हमारे किसान अपना आलू महज 400-500 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचने को मजबूर हैं, जिससे उन्हें लागत तक नहीं मिल पाती. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम आज भी आलू को सिर्फ एक 'सब्जी' की तरह देख रहे हैं, जबकि पूरी दुनिया इसे एक बड़ी 'इंडस्ट्रियल फसल' (औद्योगिक फसल) मानकर इससे मोटा मुनाफा कमा रही है. आज वैश्विक स्तर पर आलू प्रोसेसिंग चिप्स, फ्रेंच फ्राइज़, पाउडर का बाजार करीब 3.72 लाख करोड़ रुपये का है, जो 2031 तक बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा. अगर भारतीय किसान को सही दाम दिलाना है, तो हमें भी आलू को सिर्फ रसोई तक सीमित न रखकर उसे फैक्ट्रियों और वैश्विक बाजार से जोड़ना होगा.

गुजरात का  मॉडल, यूपी और बिहार के लिए सबक

आलू से पैसा कैसे कमाया जाता है, यह गुजरात के किसानों ने कर दिखाया है. उत्तर प्रदेश , बंगाल , बिहार उत्पादन में भले ही आगे हों, लेकिन कमाई में गुजरात बाजी मार रहे हैं. गुजरात ने पिछले 20 सालों में आलू की प्रोसेसिंग चिप्स, वेफर्स, फ्राइज़ पर ध्यान दिया. आज वहां के कुल प्रोसेस्ड आलू का 60% हिस्सा वेफर्स और 40% फ्रेंच फ्राइज़ बनाने में जाता है. यहां का किसान सीधा कंपनियों से जुड़ा है. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से उसे बाजार के उतार-चढ़ाव का डर नहीं रहता. अगर हमें देश के बाकी किसानों की हालत सुधारनी है, तो गुजरात का यह मॉडल पूरे देश में लागू करना होगा. एक कंपनी प्रतिनिधि के मुताबिक, गुजरात में 'कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग' की तरह बुवाई के वक्त ही दाम फिक्स कर लिए जाते हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि बाजार भाव चाहे जो भी हो, किसान को कम से कम 10 रुपये प्रति किलो का गारंटीड रेट मिलता है.

ग्लोबल मार्केट में भारतीय आलू की जरूरत क्यों?

डॉ ब्रजेश कुमार सिंह, केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) शिमला के निदेशक के अनुसार, भारत के पास दुनिया का 'आलू हब' बनने की सबसे बड़ी वजह हमारा खास मौसम है. जब यूरोप और दुनिया के बाकी हिस्सों में कड़ाके की ठंड पड़ती है और वहां खेती मुश्किल होती है, ठीक उसी समय भारत का 90% ताजा आलू पककर तैयार होता है. साथ ही, दूसरे देशों के मुकाबले भारत में आलू उगाने की लागत भी काफी कम आती है.
अगर हम कच्चे आलू के साथ-साथ 'प्रोसेस्ड आलू' जैसे फ्रेंच फ्राइज और फ्लेक्स पर थोड़ा और ध्यान दें, तो हम मलेशिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे बड़े खरीदारों के बाजार पर कब्जा कर सकते हैं. इतना ही नहीं, हम खाड़ी देशों और यूरोप के बाजारों में भी अपना पैर पसार सकते हैं, जहां भारतीय आलू की मांग बहुत ज्यादा है.

इतनी ताकत होने के बाद भी हम पीछे क्यों? 

अगर हम अपनी इस ताकत का सही इस्तेमाल करें, तो विदेशी मुद्रा के साथ-साथ हमारे किसानों की झोली भी खुशियों से भर जाएगी. मगर देश के आलू की ग्लोबल मार्केट में पकड़ मजबूत ना होने का इसकी सबसे बड़ी कमी है 'सर्टिफिकेशन' और क्वालिटी कंट्रोल. विदेशी बाजार बहुत सख्त हैं. वे ज्यादा कीटनाशक वाला आलू नहीं खरीदते. साथ ही, हमारे पास खेतों से लेकर बंदरगाहों तक 'कोल्ड चेन' की कमी है. भारत के आलू का दुनिया में अभी कोई बड़ा 'ब्रांड' नहीं बन पाया है. जब तक हम अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से पैकेजिंग और क्वालिटी नहीं सुधारेंगे, तब तक हम ग्लोबल लीडर नहीं बन पाएंगे. आज का दौर सिर्फ कच्चे आलू का नहीं, बल्कि उससे बनने वाले 'प्रोसेस्ड फूड' जैसे चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और पाउडर का है. दुनिया भर में इन चीजों की मांग अरबों-खरबों में है.

सिर्फ कच्चा आलू बेचना घाटे का सौदा

डॉ ब्रजेश सिंह ने बताया कि भारत आलू प्रोसेसिंग की रेस में अभी थोड़ा पीछे है. हम अपने कुल आलू का मात्र 8 फीसदी ही प्रोसेस कर पाते हैं, जबकि चीन हमसे दोगुना यानी 15 फीसदी प्रोसेस करता है. विकसित देशों की बात करें तो अमेरिका और यूरोप में तो 30 फीसदी से 67 फीसदी तक आलू फैक्ट्रियों में जाकर कीमती प्रॉडक्ट्स में बदल जाता है. आने वाले समय में यह मौका और बड़ा होने वाला है, क्योंकि अनुमान है कि 2050 तक सिर्फ प्रोसेसिंग के लिए ही 250 लाख टन आलू की जरूरत पड़ेगी. पिछले तीन सालों में हमारे आलू निर्यात में 450 फीसदी की जो शानदार बढ़त दिखी है, वह तो बस एक ट्रेलर है. अगर हम वियतनाम, सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे देशों की पसंद के हिसाब से तैयारी करें, तो भारत सही मायनों में दुनिया का 'पोटैटो किंग' बन सकता है. इससे न केवल विदेशी पैसा आएगा, बल्कि जब आलू सीधे फैक्ट्रियों में जाएगा तो किसानों को भी अपनी फसल के ऊंचे और पक्के दाम मिलेंगे.

कागजों से निकलकर खेतों तक पहुंचे सरकारी मदद

आलू के क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए सिर्फ सरकारी कागज भरना काफी नहीं है, बल्कि नीतियों को खेत की जमीन तक उतारना होगा. सरकार को एक ऐसी 'सिंगल विंडो' व्यवस्था (एक ही जगह सारी सुविधाएं) बनानी चाहिए, जिससे छोटा किसान भी बिना किसी कानूनी उलझन के अपना आलू विदेशों में बेच सके. अभी हम निर्यात के लिए ज्यादातर पश्चिमी बंदरगाहों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अब हमें कोलकाता और विशाखापट्टनम जैसे पूर्वी बंदरगाहों को भी आधुनिक बनाना होगा. इससे दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों तक हमारा माल कम समय और कम खर्चे में पहुंच सकेगा. साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के आलू प्रोसेसिंग मार्केट में भारत की हिस्सेदारी अभी सिर्फ 3.4% है. हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि अगले 5 सालों में इसे बढ़ाकर कम से कम 10% तक ले जाएं. जब हमारे पास आलू की छंटाई करने वाली आधुनिक मशीनें, अंतरराष्ट्रीय स्तर की शानदार पैकेजिंग और विदेशी खरीदारों से सीधा नाता होगा, तभी किसान का आलू वाकई उसके लिए 'सोना' उगलेगा और उसे अपनी मेहनत का सही दाम मिलेगा.

ये भी पढ़ें-

POST A COMMENT