10 उत्पाद को जीआई टैग मिलने का रास्ता साफबिहार के खेतों, गांवों और स्थानीय हुनर से निकले उन उत्पादों के लिए बड़ी खबर है, जो अपनी विशिष्ट पहचान के लिए जाने जाते हैं. वैसे उत्पादों को जीआई टैग दिलाने के लिए सरकार की ओर से बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है. इसी क्रम में बीते दिनों बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर द्वारा 20वीं जीआई समीक्षा बैठक आयोजित की गई. जहां 28 GI आवेदनों की समीक्षा की गई.
बैठक में बताया गया कि बिहार के 28 उत्पादों को उसकी पहचान और खासियत के लिए GI टैग देने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है. इनमें से 10 उत्पादों को टैग देने की प्रक्रिया अंतिम सीजीएम चरण में पहुंच चुकी है. इसके अलावा शाहाबाद के अनरसा, मनेर के लड्डू और कोसी जूट जैसे नए उत्पादों को जीआई दिलाने का प्रस्ताव रखा गया.
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में हुई 20वीं जीआई समीक्षा बैठक के दौरान बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के अनुसंधान निदेशक और GI फैसिलिटेशन सेंटर के प्रधान अन्वेषक डॉ अनिल कुमार सिंह ने बताया कि 28 GI आवेदनों की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है. इनमें 10 आवेदन अंतिम सीजीएम चरण में पहुंच चुके हैं. यानी इन उत्पादों के GI रजिस्ट्रेशन की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव पार किया जा चुका है. आगे उन्होंने कहा कि जीआई टैग सिर्फ किसी उत्पाद के नाम के साथ जुड़ने वाला प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि उसकी पहचान, ब्रांडिंग और बाजार की पूरी तस्वीर बदलने का जरिया बन सकता है.
GI पहचान मिलने के बाद किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक क्षेत्र और विशिष्ट गुणों के आधार पर अलग पहचान दी जाती है. यही वजह है कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय अब GI रजिस्ट्रेशन के साथ-साथ इन उत्पादों की ब्रांडिंग, प्रचार-प्रसार और बाजार से जोड़ने की रणनीति पर तेजी से काम कर रहा है. बिहार को पहले ही भागलपुरी जरदालू, शाही लीची, कतरनी चावल, मगही पान और मिथिला मखाना सहित 5 उत्पादों को जीआई पहचान मिल चुका है.
विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि बिहार की कृषि और सांस्कृतिक विरासत को GI पहचान दिलाना केवल रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया नहीं है. इससे स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने, किसानों की आय बढ़ाने और उनके लिए बेहतर बाजार तैयार करने के अवसर पैदा होते हैं.
बैठक में सिर्फ पहले से चल रहे प्रस्तावों की समीक्षा नहीं हुई, बल्कि कुछ नए उत्पादों को भी GI पहचान दिलाने पर चर्चा हुई. इनमें शाहाबाद अनरसा, मनेर का लड्डू और कोसी जूट प्रमुख हैं. इन उत्पादों के पीछे बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट पहचान और परंपरा जुड़ी हुई है. ऐसे में GI प्रक्रिया के जरिए बिहार की कोशिश है कि स्थानीय स्वाद, कृषि उत्पाद और पारंपरिक हुनर को एक व्यवस्थित रूप से वैश्विक पहचान दी जाए.
जीआई आवेदनों की समीक्षा बैठक में बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के साथ नाबार्ड के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया. महाप्रबंधक अनामिका और सहायक महाप्रबंधक जितेंद्र कुमार साहू ऑनलाइन माध्यम से बैठक में शामिल हुए. बैठक में किसानों के बीच GI उत्पादों को लेकर जागरुकता बढ़ाने और उपलब्ध निधि के प्रभावी इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई.
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