केंद्र के AI आधारित बासमती धान सर्वे पर छ‍िड़ी बहस, 40 लाख हेक्टेयर लक्ष्य से GI दायरे पर उठे सवाल, पढ़ें डिटेल

केंद्र के AI आधारित बासमती धान सर्वे पर छ‍िड़ी बहस, 40 लाख हेक्टेयर लक्ष्य से GI दायरे पर उठे सवाल, पढ़ें डिटेल

केंद्र सरकार के एआई आधारित बासमती धान सर्वे प्रोजेक्ट के 40 लाख हेक्टेयर लक्ष्य ने उद्योग में बहस तेज कर दी है. प्रस्तावित सर्वे क्षेत्र, वास्तविक खेती और GI दायरे के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जबकि मध्य प्रदेश को शामिल करने का मामला अभी अदालत में लंबित है.

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केंद्र के AI आधारित बासमती धान सर्वे पर छ‍िड़ी बहस, 40 लाख हेक्टेयर लक्ष्य से GI दायरे पर उठे सवाल, पढ़ें डिटेलबासमती चावल (सांके‍ति‍क तस्‍वीर)

एआई आधारित बासमती धान सर्वे प्रोजेक्ट (2026-2028) की घोषणा के बाद कृषि और निर्यात क्षेत्र में बहस तेज हो गई है. केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री जितिन प्रसाद द्वारा पेश इस योजना में करीब 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि एपीडा की 2023 रिपोर्ट में बासमती खेती का दायरा लगभग 21.4 लाख हेक्टेयर बताया गया था. 'बिजनेसलाइन' ने अपनी एक रिपोर्ट में उद्योग सूत्रों के हवाले से लिखा है कि प्रस्तावित सर्वे क्षेत्र न तो वास्तविक बासमती खेती के औसत दायरे (करीब 21 लाख हेक्टेयर) के बराबर है और न ही पूरे जीआई टैग क्षेत्र (60 लाख हेक्टेयर से अधिक) के समान है. यही अंतर इस पूरी बहस का केंद्र बन गया है और इसे संभावित GI दायरे के विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि, मध्य प्रदेश को GI क्षेत्र में शामिल करने का मामला अभी अदालत में लंबित है.

प्रोजेक्ट का दायरा और मकसद

रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने कहा है कि यह सर्वे करीब 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में किया जाएगा. इसमें 1.5 लाख से ज्यादा ग्राउंड डेटा पॉइंट्स जुटाए जाएंगे और 5 लाख से अधिक किसानों को जोड़ा जाएगा. योजना का उद्देश्य सटीक उत्पादन आकलन, बासमती किस्मों की पहचान, वैज्ञानिक सलाह और निर्यात की बेहतर योजना तैयार करना है.

वहीं, इस परियोजना की फंडिंग बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन के कोष से होने की बात सामने आई है. यह कोष बासमती निर्यातकों से प्रति टन 70 रुपये शुल्क लेकर तैयार किया जाता है, जो शिपमेंट से पहले अनिवार्य पंजीकरण के तहत लिया जाता है. एक उद्योग संस्था की संभावित भागीदारी और उसके प्रतिनिधि के BEDF बोर्ड में होने को लेकर हितों के टकराव की आशंका भी जताई जा रही है.

पुराना सर्वे बंद होने पर उठे सवाल

उद्योग सूत्रों का कहना है कि अगर कोविड महामारी को अपवाद के रूप में छोड़ दें तो 2023 तक हर साल बासमती सर्वे किया जाता था. लेकिन, 2024 से इसे बंद कर दिया गया. सूत्रों ने कहा कि कुछ निर्यातकों के दबाव में यह निर्णय लिया गया है. साथ ही सर्वे एजेंसी से गैर-GI क्षेत्रों को शामिल करने का सुझाव भी दिया गया था, जिसे यह कहते हुए ठुकरा दिया गया कि उन क्षेत्रों की फसल को कानूनी तौर पर बासमती नहीं माना जा सकता.

उद्योग संगठन ने दी प्रतिक्रिया

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने कहा है कि उसे अब तक इस सर्वे के लिए संपर्क नहीं किया गया है. संगठन के महानिदेशक विनोद कौल ने कहा कि अगर मौका मिला तो वे इस पहल में शामिल होना चाहेंगे. उन्‍होंने कहा कि व्यवस्थित क्रॉप सर्वे ही सटीक डेटा और बेहतर नीति निर्माण का आधार बन सकता है. उन्होंने सुझाव दिया कि GI और गैर-GI क्षेत्रों के लिए अलग-अलग सर्वे रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए.

बासमती का GI दायरा और कानूनी स्थिति

बासमती का GI क्षेत्र जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली तक फैला हुआ है. वर्ष 2016 में चेन्नई स्थित GI रजिस्ट्री ने एपीडा को बासमती के लिए GI प्रमाणपत्र जारी किया था और मध्य प्रदेश को इसमें शामिल करने की मांग खारिज कर दी थी. इसके बाद GI अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी मध्य प्रदेश की अपील खारिज करते हुए इस आदेश को बरकरार रखा था.

जब मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने राज्य सरकार से पूछा था कि उसने GI रजिस्ट्रार के समक्ष प्रमाणपत्र में संशोधन या रद्दीकरण के वैधानिक विकल्प का इस्‍तेमाल क्यों नहीं किया. बाद में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने 2021 में इसे दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया. तब से यह मामला लंबित है.

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