अमेर‍िकी ट्रेड डील के शोर के बीच जान‍िए कैसे सरकारी नीत‍ियों ने मक्का क‍िसानों को क‍िया बर्बाद!

अमेर‍िकी ट्रेड डील के शोर के बीच जान‍िए कैसे सरकारी नीत‍ियों ने मक्का क‍िसानों को क‍िया बर्बाद!

अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर सियासी घमासान के बीच मक्का आयात बड़ा मुद्दा बन गया है. TRQ स्कीम के जरिए विदेशों से सस्ता मक्का आ रहा है, जबकि बिहार जैसे राज्यों के किसान अपनी उपज बेचने को तरस रहे हैं.

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अमेर‍िकी ट्रेड डील के शोर के बीच जान‍िए कैसे सरकारी नीत‍ियों ने मक्का क‍िसानों को क‍िया बर्बाद!अमेरिका-भारत ट्रेड डील की बहस के बीच मक्के का आयात

देश में अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर राजनीतिक बहस तेज है. सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं. सरकार का दावा है कि इस समझौते में किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया, जबकि विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर कृषि क्षेत्र को सरेंडर कर दिया है. इस बहस के केंद्र में मक्का आ गया है, जो मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के किसानों के लिए जीवनरेखा माना जाता है. कमाई का बड़ा सोर्स माना जाता है.

सरकार बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि अमेरिका से जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) मक्का आयात नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह भारत के कानून, फूड सेफ्टी और सांस्कृतिक मानकों के अनुरूप नहीं है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि सरकार म्यांमार और यूक्रेन जैसे देशों से मक्का आयात की अनुमति देती रही है. इस समय जीरो ड्यूटी पर मक्का आ रहा है. सवाल यह है कि जब भारत, खासकर बिहार और मध्य प्रदेश के किसानों के पास लाखों टन मक्का बिना खरीदार के पड़ा है, तो फिर आयात की जरूरत क्यों पड़ रही है?

मक्के का आयात क्यों? 

इस सवाल का जवाब टैरिफ रेट कोटा यानी TRQ स्कीम में छिपा है. इस स्कीम के तहत सरकार घरेलू बाजार में कीमतें काबू में रखने के नाम पर मक्के के आयात पर जीरो या बेहद कम इंपोर्ट ड्यूटी की अनुमति देती है. तर्क दिया जाता है कि देश में मक्के के दाम बढ़ रहे हैं और इथेनॉल, पोल्ट्री फीड और इंडस्ट्रियल इस्तेमाल के लिए पर्याप्त सप्लाई जरूरी है.

आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 वित्त वर्ष में भारत मक्के का नेट इंपोर्टर बन गया. इस दौरान करीब 9.7 लाख टन मक्के का आयात हुआ, जबकि घरेलू उत्पादन बंपर था. 2023-24 में मक्का आयात 1.37 लाख टन से बढ़कर करीब छह गुना हो गया. सरकार इसकी वजह 20 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग टारगेट और पोल्ट्री फीड सेक्टर की बढ़ती मांग बताती है.

अपने क‍िसानों से क्यों नहीं खरीदा?  

लेकिन यही वह दौर था जब बिहार जैसे राज्यों में किसान अपनी उपज के सही दाम के लिए भटक रहे थे. MSP की बात तो दूर, खुले बाजार में भी खरीदार नहीं मिल रहे थे. किसान सवाल कर रहे हैं कि जब उनके घरों में मक्का सड़ रहा है, तो म्यांमार और यूक्रेन से मक्का मंगाने की मजबूरी क्या है? अगर मक्का इथेनॉल और पोल्ट्री फीड के लिए चाहिए, तो बिहार के मक्के में ऐसी कौन सी कमी है कि न इथेनॉल फैक्ट्रियां उसे खरीद रही हैं और न ही फीड इंडस्ट्री? सरकार यह भी कहती है कि आयात मुख्य रूप से स्टार्च और प्रोसेस्ड फॉर्म में होता है, जो अमेरिका, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड और जापान जैसे देशों से आता है.

टीआरक्यू स्कीम से नुकसान

हालांकि हकीकत यह है कि टीआरक्यू जैसी स्कीमों के जरिए मक्का आयात लगातार जारी है, भले ही वह सीधे खाने या फीड के लिए न हो. इसका सीधा असर देश के मक्का किसानों पर पड़ रहा है, खासकर बिहार में, जहां उत्पादन तो है लेकिन खरीद की व्यवस्था नहीं. कुल मिलाकर, अमेरिकी ट्रेड डील को लेकर चाहे जितना सियासी शोर मचाया जाए, लेकिन मक्के के मामले में असली सवाल यही है कि जब देश में पर्याप्त मक्का मौजूद है, तो आयात क्यों क‍िया जा रहा है. नीतियां किसके हित में बनाई जा रही हैं-किसानों के या उद्योग और आयातकों के?

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