चीनी बिक्री का कोटा घटा (सांकेतिक तस्वीर)केंद्र सरकार ने जनवरी महीने के लिए चीनी की घरेलू बिक्री कोटा घटा दिया है, जबकि 2025-26 सीजन में कुल उत्पादन बढ़ने का अनुमान है. सरकार ने जनवरी में घरेलू बाजार के लिए 22 लाख टन चीनी की बिक्री की अनुमति दी है, जो पिछले साल इसी महीने के 22.5 लाख टन से करीब 2.2 प्रतिशत कम है. इससे पहले अक्टूबर से जनवरी के बीच पहले चार महीनों का कुल रिलीज कोटा 88 लाख टन रहा है, जो बीते सीजन की समान अवधि की तुलना में 4.3 प्रतिशत कम है. चीनी उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस साल बाजार में मांग कमजोर बनी हुई है.
‘बिजनेसलाइन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर और नवंबर के दौरान वास्तविक बिक्री अनुमान से करीब 50 हजार टन कम रही, जिससे सरकार के लिए बढ़े हुए उत्पादन के बीच संतुलन साधना और मुश्किल हो गया है. उद्योग पहले ही यह आशंका जता चुका था कि अगर अतिरिक्त स्टॉक का सही प्रबंधन नहीं हुआ तो गन्ना किसानों के भुगतान में देरी की स्थिति बन सकती है.
सरकार द्वारा जारी मिल-वार कोटा आवंटन के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा असर कर्नाटक पर पड़ा है. राज्य की चीनी मिलों को जनवरी में 3.49 लाख टन चीनी बेचने की अनुमति मिली है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 4.25 लाख टन था. यानी कर्नाटक के हिस्से में करीब 18 प्रतिशत की कटौती की गई है. इसके उलट उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े उत्पादक राज्यों को अधिक कोटा दिया गया है.
उत्तर प्रदेश की मिलों को जनवरी में 7.06 लाख टन घरेलू बिक्री कोटा मिला है, जो पिछले साल के 6.86 लाख टन से लगभग 2.8 प्रतिशत अधिक है. वहीं, महाराष्ट्र को 8.57 लाख टन का कोटा दिया गया है, जो सालाना आधार पर 4.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दिखाता है. सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक में कोटे की कटौती का सीधा संबंध वहां किसानों के आंदोलन से नहीं है, बल्कि यह एक तय फॉर्मूले के तहत हुआ है, जो सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है.
दरअसल, इस बार चीनी उद्योग में घरेलू बिक्री और निर्यात कोटे की अदला-बदली ने तस्वीर बदली है. कुछ मिलों ने अपने घरेलू कोटे को अन्य राज्यों की मिलों के निर्यात कोटे से स्वैप किया है. कर्नाटक की समीरवाड़ी शुगर फैक्ट्री, जो गोदावरी बायोरिफाइनरीज से जुड़ी है, ने करीब 12 हजार टन से ज्यादा का घरेलू बिक्री कोटा छोड़कर उसे निर्यात कोटे से बदल लिया.
इसके बाद इस फैक्ट्री का संशोधित निर्यात कोटा बढ़कर 35,449 टन हो गया है. महाराष्ट्र की कुछ सहकारी मिलों ने भी इसी तरह घरेलू कोटा छोड़कर निर्यात कोटा बढ़ाया है. हालांकि, नियम यह है कि किसी एक मिल को अपने ही घरेलू कोटे को सरेंडर करके निर्यात कोटा बढ़ाने की अनुमति नहीं होती, बल्कि यह अदला-बदली दो अलग-अलग मिलों के बीच ही की जा सकती है.
इस सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान 343 लाख टन लगाया गया है, जो 2024-25 के 300 लाख टन से भी कम उत्पादन के मुकाबले काफी ज्यादा है. सरकार ने निर्यात कोटा भी बढ़ाकर 15 लाख टन कर दिया है, जो पिछले साल 10 लाख टन था. हालांकि इसका असर इथेनॉल कोटे में कटौती से संतुलित हो गया है.
इस बार इथेनॉल के लिए 29 लाख टन का कोटा तय किया गया है, जबकि पिछले साल यह 35 लाख टन था. चूंकि सी-हैवी मोलासेस से इथेनॉल बनाना गन्ने के रस या सिरप से सीधे इथेनॉल बनाने की तुलना में ज्यादा लाभकारी होता है, इसलिए कई मिलें इस बार ज्यादा चीनी उत्पादन पर फोकस कर रही हैं. इसके साथ ही बेहतर पेराई और रिकवरी दर ने भी उत्पादन को बढ़ाया है.
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