क्यों बंद हुआ शुगर का लेवी सिस्टमआज देश का आम नागरिक जब सुबह की नींद से जागकर चाय की चुस्की लेता है, तो उसे उस प्याली में मिठास से ज्यादा महंगाई की कड़वाहट महसूस होती है. खुदरा बाजार की जमीनी हकीकत यह है कि सामान्य चीनी के दाम 65 रुपये प्रति किलो के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं. सुबह की चाय से लेकर त्योहारों के पकवानों तक, खाने-पीने की हर जरूरी चीज पर बढ़ती महंगाई ने देश के मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के सामने एक संकट खड़ा कर दिया है. यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बेकाबू महंगाई से गरीबों को राहत देने के लिए सरकार को चार दशक पुराना और बेहद सख्त 'लेवी शुगर सिस्टम' (Levy Sugar System) वापस लागू कर देना चाहिए, या फिर बाजार को उसके हाल पर छोड़ देना ही सही नीति है?
यह क्यों शुरू हुआ था? इस व्यवस्था को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब भारत खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनने के लिए संघर्ष कर रहा था. वर्ष 1955 में सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) बनाया था, जिसका मकसद जमाखोरी रोकना और हर नागरिक तक राशन पहुंचाना था. इसी कानून के तहत आगे चलकर वर्ष 1976 में संसद ने 'द लेवी शुगर प्राइस इक्वलाइजेशन फंड एक्ट' पास किया और वर्ष 1979 में औपचारिक रूप से 'लेवी शुगर (आपूर्ति और नियंत्रण) आदेश' लागू हुआ.
जमाखोरी और कालाबाजारी पर नकेल इसकी एक बड़ी वजह थी. सत्तर और अस्सी के दशक में देश में चीनी मिलें और बड़े व्यापारी अक्सर त्योहारों के समय चीनी गोदामों में दबा देते थे, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती थी और दाम अचानक बढ़ जाते थे. इसे रोकने के लिए सरकार ने मिलों पर सीधा नियंत्रण करना तय किया.
दूसरी वजह राशन व्यवस्था यानी पीडीएस को मजबूत करना था. देश की एक बहुत बड़ी आबादी बेहद गरीब थी जो बाजार भाव पर चीनी नहीं खरीद सकती थी. सरकार उनके लिए एक ऐसी सुरक्षा ढाल चाहती थी जिससे अमीर भले ही महंगी चीनी खाए, लेकिन गरीब की रसोई में मिठास कम न हो.
यह प्रणाली पूरी तरह से "क्रॉस-सब्सिडी" के सिद्धांत पर आधारित थी. यानी एक से कमाकर दूसरे को राहत देना. सरकार हर साल चीनी मिलों के लिए एक अनिवार्य कोटा तय करती थी. शुरुआती दशकों में यह कोटा 40 से लेकर 60 फीसदी तक हुआ करता था, जो बाद में चीनी का उत्पादन बढ़ने पर धीरे-धीरे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया. यदि किसी मिल ने 100 बोरी चीनी का उत्पादन किया, तो नियम के मुताबिक उसे 10 बोरी चीनी लेवी कोटा के तहत अनिवार्य रूप से केंद्र सरकार को सौंपनी पड़ती थी. सरकार इस चीनी को मिलों से बहुत ही सस्ते और पूर्व-निर्धारित रेट पर खरीदती थी, जो अक्सर मिलों की वास्तविक उत्पादन लागत से भी कम होता था.
इसके बाद सरकार इस रियायती चीनी को देश भर के राशन डिपो में भेज देती थी, जहां राशन कार्ड धारक गरीब परिवारों को यह बेहद सस्ते भाव पर बांटी जाती थी. मिलों को हुए इस घाटे की भरपाई करने के लिए सरकार उन्हें छूट देती थी कि वे बाकी बची 90 फीसदी चीनी फ्री-सेल कोटा के तहत खुले बाजार में बड़े औद्योगिक खरीदारों जैसे बिस्कुट, कन्फेक्शनरी और मिठाई निर्माताओं को ऊंचे और मुनाफे वाले दामों पर बेच सकें.
हालांकि, 2000 के दशक के अंत तक आते-आते यह कल्याणकारी व्यवस्था खुद चीनी उद्योग और भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ा नासूर बन गई. वर्ष 2012 में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA-2 सरकार के सामने चीनी उद्योग पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस गहरे संकट से निकलने के लिए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया.
डॉ. सी. रंगराजन कमेटी ने अक्टूबर 2012 में अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि लेवी व्यवस्था चीनी उद्योग का दम घोंट रही है और इसे तुरंत खत्म कर देना चाहिए. इस सिफारिश को स्वीकार करते हुए तत्कालीन खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री केवी थॉमस की देखरेख में केंद्रीय कैबिनेट ने अप्रैल 2013 में बड़ा फैसला लिया. सरकार ने 1 अक्टूबर 2012 के बाद उत्पादित होने वाली सभी चीनी पर से मिलों के लेवी दायित्व को हमेशा के लिए खत्म कर दिया और चीनी बाजार को आंशिक रूप से नियंत्रण मुक्त यानी डी-कंट्रोल कर दिया. इसके बदले सरकार ने नीति बदली कि राशन के लिए राज्यों को खुली छूट होगी कि वे मार्केट रेट पर चीनी खरीदें और केंद्र सरकार निश्चित सब्सिडी सीधे राज्यों को भुगताएगी ताकि गरीबों को सस्ती चीनी मिलती रहे.
गन्ना किसानों का भारी बकाया संकट को इसकी एक बड़ी वजह बताया गया. चीनी मिलों का तर्क था कि सरकार उनसे जबरन उनकी लागत से भी कम दाम पर चीनी ले लेती है, जिससे उनका पूरा कैश-फ्लो यानी नकदी का प्रवाह बिगड़ जाता है. इस आर्थिक घाटे के कारण मिलें गन्ना किसानों को उनका उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) समय पर नहीं चुका पा रही थीं. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में किसानों का बकाया बढ़ रहा था, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हाहाकार मचा हुआ था और बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन हो रहे थे.
चीनी मिलों का आधुनिकीकरण रुकने को भी इसकी वजह बताया गया. दरअसल, लगातार घाटा झेलने के कारण देश की सैकड़ों सहकारी और निजी चीनी मिलें बीमार घोषित होकर बंद होने लगीं. मिलों के पास नई तकनीक और पेराई क्षमता बढ़ाने के लिए पूंजी ही नहीं बची थी. यही नहीं, मिलें सरकार को दिए गए सस्ते कोटे का नुकसान पूरा करने के लिए खुले बाजार की चीनी को जानबूझकर और महंगा कर देती थीं, जिससे राशन कार्ड से बाहर वाले आम मध्यम वर्ग पर दोहरी मार पड़ रही थी.
अब सवाल यह उठता है कि चीनी की बढ़ती महंगाई से आम आदमी को राहत देने के लिए क्या फिर से यह लेवी सिस्टम शुरू कर देना चाहिए? जब सरकार देश की अर्थव्यवस्था पर लाखों करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ उठाकर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत 80 करोड़ से अधिक लोगों को हर महीने लाखों टन गेहूं और चावल पूरी तरह 'मुफ्त' बांट सकती है, तो फिर गरीब की थाली की एक और सबसे जरूरी चीज यानी चीनी को पूरी तरह बेलगाम बाजार और सटोरियों के भरोसे क्यों छोड़ दिया गया है? उसे भी पूरी तरह या आंशिक रूप से सस्ता क्यों नहीं किया जा सकता? क्या सरकार इसलिए इस सिस्टम को वापस नहीं लाना चाहती कि काफी चीनी मिलें नेताओं की हैं?
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