कश्मीर में शहद उत्पादन घटा (सांकेतिक तस्वीर)अप्रैल के आखिरी हफ्ते में श्रीनगर से करीब 30 किलोमीटर दक्षिण स्थित घाटी के गंगू गांव के मधुमक्खी पालक आबिद अली जब अपनी दर्जनों मधुमक्खी कॉलोनियों के साथ वापस लौटे, तब उन्हें इस बार शहद उत्पादन बेहतर रहने की उम्मीद थी. आबिद अली हर साल की तरह सर्दियों के महीनों में प्रवासी मधुमक्खी पालन चक्र के तहत राजस्थान और पंजाब में समय बिताकर लौटे थे. लेकिन, घाटी पहुंचने के बाद मौसम ने उनके अनुमान को पूरी तरह बदल दिया.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार घाटी में लंबे समय तक बनी बारिश, सामान्य से कम तापमान और कमजोर फूलों के सीजन ने मधुमक्खी पालन क्षेत्र को प्रभावित किया. आबिद अली ने कहा, “मेरे पास 150 से ज्यादा कॉलोनियां हैं और मैं सिर्फ 30 किलो शहद ही निकाल पाया, जबकि सामान्य तौर पर करीब 100 किलो तक उत्पादन हो जाता है.” उन्होंने बताया कि तापमान में अचानक गिरावट के कारण मधुमक्खियां लंबे समय तक छत्तों से बाहर नहीं निकल सकीं और पर्याप्त मात्रा में फूलों से रस नहीं जुटा पाईं.
आबिद अली ने कहा कि इस बार अकेशिया के पेड़ों पर फूल भी पर्याप्त मात्रा में नहीं आए. इससे मधुमक्खियों के लिए रस की उपलब्धता कम हो गई. अकेशिया शहद घाटी की प्रीमियम श्रेणी की शहद किस्म मानी जाती है. इसकी हल्की रंगत, अलग स्वाद और बाजार में मजबूत मांग इसे खास बनाती है, लेकिन इस सीजन में उत्पादन उम्मीद से काफी नीचे रहा.
पिछले कुछ वर्षों में होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम और नेशनल बीकीपिंग एंड हनी मिशन के तहत जम्मू-कश्मीर के मधुमक्खी पालन क्षेत्र में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 से 2025 के बीच प्रदेश में शहद उत्पादन करीब 2200 मीट्रिक टन से बढ़कर 3895 मीट्रिक टन से अधिक पहुंच गया था. तीन वर्षों में यह वृद्धि 75 प्रतिशत से ज्यादा रही. लेकिन, इस बार मौसम के असर ने पिछले वर्षों की इस प्रगति को झटका दिया है.
घाटी की प्रमुख शहद उत्पादक संस्था अल नहल प्रोड्यूसर कंपनी के चेयरमैन नाजिम नजीर ने कहा, “कम उत्पादन की वजह से इस सीजन में हममें से कई लोग परिवहन और मधुमक्खियों के रखरखाव की लागत तक नहीं निकाल पाए हैं.” उन्होंने कहा कि कम उत्पादन का असर खास तौर पर उन युवाओं पर पड़ा है, जिन्होंने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में निवेश किया था.
नाजिम नजीर ने कहा कि घाटी में मधुमक्खियां मुख्य रूप से अकेशिया और सेब के फूलों पर निर्भर रहती हैं, लेकिन इस बार मौसम की अनिश्चितता ने दोनों फसली चक्रों को प्रभावित किया. बदलते मौसमी पैटर्न के कारण प्रवासी मधुमक्खी पालन की योजना बनाना और इसे टिकाऊ बनाए रखना लगातार कठिन होता जा रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में तेज विकास के बावजूद मधुमक्खी पालन क्षेत्र अब भी मौसम के प्रति बेहद संवेदनशील बना हुआ है. शहद उत्पादन सीधे तौर पर फूलों की तीव्रता और जलवायु की स्थिरता पर निर्भर करता है. ऐसे में मौसम में बढ़ती अनिश्चितता आने वाले समय में इस क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है.
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