दलहन में देश को आत्मनिर्भर बनाने की तैयारीसंसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति ने तिलहन और दालों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 100 प्रतिशत करने की मांग की है—जो अभी 25 प्रतिशत है—ताकि इन दोनों चीजों के आयात बिल को कम किया जा सके. इसके साथ ही समिति ने कई अन्य सिफारिशें भी की हैं, जिनमें एक इंपोर्ट ड्यूटी से जुड़ा है. इसके तहत, जब वैश्विक कीमतें 800 डॉलर प्रति टन से नीचे गिरती हैं, तो घरेलू किसानों को कीमतों में होने वाले अचानक बदलावों (price shocks) से बचाने के लिए पाम तेल पर 20 प्रतिशत का सुरक्षा शुल्क (safeguard duty) लगाया जाएगा.
समिति ने अत्याधुनिक तकनीकों, जैसे कि Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats (CRISPR)-Cas9 और Marker-Assisted Selection (MAS) में निवेश बढ़ाने की भी मांग की है, ताकि जलवायु-अनुकूल, अधिक पैदावार देने वाली और कीट-प्रतिरोधी फसल की किस्में विकसित की जा सकें. इसने GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) खाद्य पदार्थों से निपटने और उनके अनियंत्रित प्रसार को रोकने के लिए एक अधिक मजबूत रेगुलेटरी सिस्टम बनाने की भी मांग की है, जिसकी अभी कमी है.
समिति की 33वीं रिपोर्ट, जिसे शुक्रवार को लोकसभा में पेश किया गया, ने खाद्य तेलों के आयात पर भारत की लगातार निर्भरता—जिसका अनुमान कुल खपत का 56 प्रतिशत है—और 2.13 मिलियन टन दालों के आयात पर चिंता जताई. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह स्थिति किसानों को वैश्विक कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है और देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालती है.
इस समस्या को हल करने के लिए, समिति ने PM-AASHA योजना के तहत खरीद का दायरा बढ़ाने की सिफारिश की, ताकि तेल बीजों के 100 प्रतिशत उत्पादन को इसके दायरे में लाया जा सके. साथ ही, सभी उत्पादक राज्यों में अरहर, उड़द और मसूर जैसी प्रमुख दालों की पूरी खरीद सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की गई. समिति ने दूरदराज के इलाकों में और अधिक खरीद केंद्र बनाने का भी सुझाव दिया, जिसके लिए एक डिजिटल पोर्टल और किसानों के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली हेल्पलाइन की मांग की गई है.
समिति ने CRISPR और Marker-Assisted Selection जैसी उन्नत बीज तकनीकों में निवेश बढ़ाने की मांग की, ताकि जलवायु-अनुकूल और अधिक पैदावार देने वाली फसल की किस्में विकसित की जा सकें. समिति ने सिफारिश की कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) 2028 तक क्षेत्र-विशेष के लिए उपयुक्त फसल की किस्में जारी करे, और बीजों के रिप्लेसमेंट रेट (seed replacement rates) को बढ़ाने के लिए 2030 तक देश के हर जिले में 'बीज केंद्र' (seed hubs) बनाए जाएं.
पैनल ने मौजूदा SATHI पोर्टल को एक बड़े "नेशनल सीड ग्रिड" में बदलने का भी प्रस्ताव दिया, ताकि पूरी बीज सप्लाई चेन को डिजिटली जोड़ा जा सके, QR कोड के जरिए बीज की पहचान (traceability) की जा सके, और सब्सिडी देने में होने वाली गड़बड़ियों को कम किया जा सके.
किसानों को सुरक्षा देने के लिए पैनल ने एक राष्ट्रीय नियामक संस्था बनाने की सिफारिश की, जो बीजों की कीमतों पर लगाम लगाए और नकली बीजों के मामले में किसानों को मुआवजा दिलाना सुनिश्चित करे. समिति ने इस बात पर जोर दिया कि 1966 के बीज अधिनियम को एक आधुनिक कानून से बदलना बेहद जरूरी है, जिसमें अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, वेरिफिकेशन और कड़ी सजा का प्रावधान हो.
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि 2028 तक पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में तिलहन और दलहन के क्लस्टर विकसित किए जाएं, और साथ ही 'प्रति बूंद अधिक फसल' (Per Drop More Crop) योजना के तहत सिंचाई के दायरे का विस्तार किया जाए. रिपोर्ट में वर्षा-आधारित क्षेत्रों में जोखिम कम करने के लिए सूक्ष्म-सिंचाई, खेत-तालाबों और IoT-आधारित जल प्रबंधन प्रणालियों के उपयोग पर भी जोर दिया गया.
किसानों की आय बढ़ाने के लिए, समिति ने किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को मजबूत करने, प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाने, और 'भारत दाल' जैसी ब्रांडेड पहलों का विस्तार करने की सिफारिश की. साथ ही, किफायती खाद्य तेलों के लिए एक नया 'भारत ऑयल' ब्रांड शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा.
पैनल ने यह प्रस्ताव भी रखा कि अलग-अलग योजनाओं के 40 प्रतिशत लाभ महिला किसानों के लिए आरक्षित किए जाएं, और ग्रामीण युवाओं को कृषि-उद्यमिता (agri-entrepreneurship) में ट्रेनिंग देने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए जाएं. कुल मिलाकर, समिति ने इस बात पर जोर दिया कि तिलहन और दलहन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के साथ-साथ किसानों के कल्याण के लिए, खरीद, टेक्नोलॉजी, बाजार और रेगुलेशन—इन सभी क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई बहुत जरूरी है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today