निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एपीडा की पहल (सांकेतिक तस्वीर)कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने देशभर में जैविक (ऑर्गेनिक) खेती करने वाले किसानों के अनिवार्य फिजिकल वेरिफिकेशन की समयसीमा बढ़ाकर अब 3 जुलाई कर दी है. यह दूसरी बार है जब इस प्रक्रिया की डेडलाइन आगे बढ़ाई गई है. यह अभियान 3 नवंबर 2025 से शुरू हुआ था. विभिन्न हितधारकों ने नेटवर्क समस्या, किसान रिकॉर्ड अपडेट करने में देरी और किसानों के अस्थायी ट्रांसफर जैसी दिक्कतों का हवाला देते हुए समय बढ़ाने की मांग की थी. इन सभी अनुरोधों की समीक्षा के बाद अथॉरिटी ने डेडलाइन आगे बढ़ाने का निर्णय लिया.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, APEDA के चेयरमैन अभिषेक देव ने बताया कि अब तक करीब 52 फीसदी किसानों का फिजिकल वेरिफिकेशन पूरा हो चुका है. पहले इस प्रक्रिया के लिए सिर्फ तीन महीने का समय दिया गया था, लेकिन ग्राउंड लेवल पर चुनौतियों के चलते इसे आगे बढ़ाना पड़ा.
सरकार ने जुलाई 2022 में लोकसभा को बताया था कि करीब 25 लाख किसान ऑर्गेनिक खेती से जुड़े हैं. वहीं 29 जुलाई 2025 को दी गई जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के तहत मान्यता प्राप्त एजेंसियों द्वारा प्रमाणित किसानों की संख्या 19,29,243 दर्ज की गई, जो 4,712 सक्रिय उत्पादक समूहों में शामिल हैं.
APEDA ने साफ किया है कि 3 जुलाई के बाद जिन किसानों का वेरिफिकेशन नहीं होगा, उन्हें ट्रेसेनेट सिस्टम में किसी भी तरह की एंट्री या अपडेट की अनुमति नहीं मिलेगी. इसमें उत्पादन अपडेट और उनके उत्पाद की सोर्सिंग भी शामिल है. जिन उत्पादक संगठनों में अब तक 20 फीसदी से कम किसानों का वेरिफिकेशन हुआ है, उन्हें 3 जून तक कम से कम 50 फीसदी कवरेज सुनिश्चित करना होगा.
अगर ऐसा नहीं होता है तो 4 जून से ऐसे समूहों के ट्रांजेक्शन सर्टिफिकेट जारी नहीं किए जाएंगे, जब तक वे 3 जुलाई से पहले 100 फीसदी वेरिफिकेशन पूरा नहीं कर लेते. APEDA ने कहा है कि सर्टिफिकेशन बॉडीज के काम की नियमित समीक्षा की जा रही है. अगर किसी एजेंसी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया गया तो राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी.
APEDA ने नए ऑर्गेनिक किसानों के रजिस्ट्रेशन, स्कोप सर्टिफिकेट के नवीनीकरण और सर्टिफिकेशन एजेंसी बदलने के लिए एनओसी जारी करने में भी वेरिफिकेशन को अनिवार्य कर दिया है. आधार के जरिए किसान की पहचान में किसी तरह की गड़बड़ी होने पर तुरंत ट्रेसेनेट की तकनीकी टीम को सूचित करना होगा. फिजिकल वेरिफिकेशन के दौरान किसानों को अपने दस्तावेज, रजिस्टर, खेत का नक्शा और रकबा रिकॉर्ड उपलब्ध रखना जरूरी होगा.
हर उत्पादक संगठन को एक मैनेजर नियुक्त करना होगा, जिसे ऑर्गेनिक खेती के इंटरनल कंट्रोल सिस्टम की जानकारी हो. साथ ही तीन सदस्यों की अप्रूवल कमेटी बनाना भी अनिवार्य है. रिपोर्ट के मुताबिक, उद्योग सूत्रों ने कहा कि उत्पादक संगठनों को इस प्रक्रिया में फीस और यात्रा खर्च मिलाकर करीब 2 लाख रुपये तक खर्च करना पड़ सकता है. यह लागत कुछ समूहों के लिए बोझ बन रही है और देरी की एक वजह भी मानी जा रही है.
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