राजस्थान ने रचा इतिहास: इस अश्वगंधा को मिला GI Tag, देखें कैसे होगा किसानों को फायदा

राजस्थान ने रचा इतिहास: इस अश्वगंधा को मिला GI Tag, देखें कैसे होगा किसानों को फायदा

केंद्र सरकार ने हाल ही में राजस्थान के नागौर जिले की प्रसिद्ध 'नागौरी अश्वगंधा' को भौगोलिक संकेतक (GI टैग) दिया है. न केवल स्थानीय किसानों की मेहनत को सम्मान देता है, बल्कि वैश्विक बाजार में इस औषधीय फसल को एक भरोसेमंद ब्रांड के रूप में स्थापित करेगा.

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राजस्थान ने रचा इतिहास: इस अश्वगंधा को मिला GI Tag, देखें कैसे होगा किसानों को फायदाअश्वगंधा को मिला GI Tag

मारवाड़ की रेतीली मिट्टी और शुष्क जलवायु ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रकृति की कठोरता में भी अनमोल खजाने छिपे होते हैं. केंद्र सरकार ने हाल ही में राजस्थान के नागौर जिले की प्रसिद्ध 'नागौरी अश्वगंधा' को भौगोलिक संकेतक (GI टैग) मिला है, जो राजस्थान के कृषि क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है. सोजत की मेहंदी के बाद यह प्रदेश का दूसरा GI टैग वाला कृषि उत्पाद है, जो न केवल स्थानीय किसानों की मेहनत को सम्मान देगा, बल्कि वैश्विक बाजार में इस औषधीय फसल को एक भरोसेमंद ब्रांड के रूप में स्थापित करेगा. इस मान्यता से मिलावट पर रोक लगेगी, निर्यात बढ़ेगा और किसानों की आय में अच्छी बढ़ोतरी होगी.

मारवाड़ की धरती पर उगती 'भारतीय जिनसेंग'

अश्वगंधा, जिसे वैज्ञानिक रूप से 'विथानिया सोम्निफेरा' कहा जाता है, आयुर्वेद की दुनिया में 'भारतीय जिनसेंग' के नाम से मशहूर है. यह एक बहुउद्देशीय जड़ी-बूटी है जो थकान मिटाने, तनाव कम करने, इम्यूनिटी बढ़ाने और नींद की समस्या दूर करने में कारगर साबित होती है. नागौर जिले में उगाई जाने वाली अश्वगंधा की खासियत इसकी जड़ें हैं, जो अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक पुष्ट और लंबी होती हैं. यहां की रेतीली मिट्टी और कम बरसात वाली जलवायु इन जड़ों में एल्कलॉइड्स, विथानोलाइड्स और अन्य औषधीय तत्वों की भरपूर मात्रा पैदा करती है. फल (बेरी) का गहरा चमकीला लाल रंग भी इसकी उच्च क्वालिटी का प्रमाण है.

कितने क्षेत्र में होती है अश्वगंधा की बुवाई

देश भर में अश्वगंधा की बुवाई लगभग 5,000 हेक्टेयर क्षेत्र में होती है, जिसमें अकेले नागौर का योगदान 500 हेक्टेयर है. ये कुल उत्पादन का 10 प्रतिशत है. लेकिन अब GI टैग के साथ 'नागौरी अश्वगंधा' का नाम दुरुपयोग से सुरक्षित हो गया है. पहले मिलावट और बिचौलियों की वजह से किसानों को उचित दाम नहीं मिल पाते थे, लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियां और आयुर्वेदिक फर्म्स सीधे किसानों से संपर्क कर सकेंगी.

GI टैग की यात्रा: प्रयास और चुनौतियां

यह उपलब्धि आसान नहीं थी. नागौरी वेलफेयर सोसाइटी की निदेशक पारुल चौधरी ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. ICAR (इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च) आनंद (गुजरात) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. परमेश्वरलाल सारण और कृषि विभाग के तकनीकी सहयोग से यह मिशन सफल हुआ. GI टैग के लिए आवेदन 12 सितंबर 2023 को दाखिल किया गया था, और भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तहत GI प्रोटेक्शन एक्ट-1999 के अनुसार इसे मंजूरी मिली. यह राजस्थान का 23वां GI टैग है, जिसमें कृषि क्षेत्र में यह दूसरा है.

कृषि अर्थशास्त्री और GI टैग सलाहकार विकास पावड़िया ने कहा कि भौगोलिक परिस्थितियां नागौरी अश्वगंधा को विशिष्ट बनाती हैं. थार रेगिस्तान की सीमाओं पर उगने वाली यह फसल अपनी जड़ों में विशेष दानों के कारण GI टैग की हकदार बनी. इससे किसानों को ब्रांडिंग का फायदा मिलेगा और युवा पीढ़ी औषधीय खेती की ओर आकर्षित होगी.

थकान मिटाने वाली 'मिरेकल रूट'

नागौरी अश्वगंधा के गुणों पर इंग्लैंड में भी रिसर्च हो चुकी है, जहां इसे तनाव और थकान मिटाने वाली 'मिरेकल रूट' कहा गया है. इसकी जड़ों में मौजूद एल्कलॉइड्स नींद की क्वालिटी सुधारते हैं, जबकि विथानोलाइड्स इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं. आयुर्वेद में इसे रसायन (रिजूवनेटर) माना जाता है, जो उम्र बढ़ाने और शारीरिक शक्ति बढ़ाने में मदद करता है. नागौर की शुष्क जलवायु से जड़ें अधिक पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं, जो इसे अन्य क्षेत्रों की अश्वगंधा से अलग करती है.

वैश्विक स्तर पर अश्वगंधा का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. डेटा ब्रिज मार्केट रिसर्च के अनुसार, 2022 से 2029 तक यह 11.4 फीसदी की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा और 2029 तक 102.72 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचेगा. हर्बल, फार्मास्युटिकल, कॉस्मेटिकल्स और न्यूट्रास्यूटिकल्स इंडस्ट्री में इसकी मांग बढ़ रही है. भारत में सालाना मांग 7,000 टन है, जबकि उत्पादन सिर्फ 1,500 टन  रही. GI टैग से नागौरी अश्वगंधा इस कमी को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकती है.

किसानों और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

GI टैग से नागौर के किसानों को बड़ा फायदा होगा. अब 'नागौरी अश्वगंधा' ब्रांड नाम से बेची जाएगी, जिससे दाम 20-30 फीसदी तक बढ़ सकते हैं. निर्यात में वृद्धि होगी, खासकर यूरोप, अमेरिका और एशियाई देशों में जहां आयुर्वेदिक उत्पादों की डिमांड बढ़ रही है. स्थानीय स्तर पर उन्नत किस्मों (जैसे उच्च उपज वाली वैरायटी) का उपयोग बढ़ेगा, और प्रसंस्करण तकनीक अपनाने से उत्पाद की क्वालिटी और बेहतर होगी.

एक स्थानीय किसान रामलाल जाट ने कहा कि पहले मिलावट की वजह से हमें कम दाम मिलते थे, लेकिन अब GI टैग से हमारी फसल की कीमत बढ़ेगी. युवा भी खेती की ओर लौट रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मारवाड़ क्षेत्र में औषधीय खेती का विस्तार होगा, जो रोजगार सृजन करेगा और रेगिस्तानी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएगा.

भविष्य की राह: चुनौतियां और अवसर

हालांकि GI टैग एक बड़ी जीत है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं. जलवायु परिवर्तन से शुष्क क्षेत्रों में पानी की कमी बढ़ रही है, इसलिए सिंचाई और उन्नत कृषि तकनीकों पर फोकस जरूरी है. सरकार और ICAR को किसानों को ट्रेनिंग और सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए. साथ ही वैश्विक बाजार में प्रमोशन के लिए एक्सपोर्ट पॉलिसी मजबूत करने की जरूरत है.

नागौरी अश्वगंधा की यह कहानी साबित करती है कि स्थानीय संसाधनों से वैश्विक ब्रांड बनाए जा सकते हैं. यह न केवल राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करेगी बल्कि किसानों को सशक्त बनाएगी. जैसा कि डॉ. सारण कहते हैं कि यह अश्वगंधा थार की धरती का चमत्कार है, जो दुनिया को स्वास्थ्य देगी.

किसानों के लिए काम कर रही नागौरी वेलफेयर सोसाइटी

विंग कमांडर अमन चौधरी ने बताया कि हमारी नागौरी वेलफेयर सोसाइटी जो कि किसानों और महिला सशक्तिकरण को लेकर भारी उत्सुक और तन मन से जुड़कर काम कर रही हैं. हमने पिछले 3 साल से हमारी सोसाइटी की निदेशक डॉ पारुल चौधरी ने इस प्रक्रिया में ICAR आनंद (गुजरात) के प्रधान वैज्ञानिक डॉक्टर परमेश्वर लाल सारण और कृषि विभाग के तकनीकी सहयोग से इस मिशन पर कामयाबी हासिल की. किसानों के हित में एक बड़ा अहम कदम उठाया. केवल कदम ही नहीं बल्कि नागौर का नाम पूरे देश भर ही नहीं वैश्विक स्तर पर "नागौरी अश्वगंधा" नाम दिलवाया है. अब जीआई टैग मिलने से नागौर के किसानों को बड़ा फायदा होगा अब नागौरी अश्वगंधा ब्रांड नाम से बेची जाएगी जिससे किसानों की आमदनी 2 गुना हो जाएगी. यह आयुर्वेदिक से लेकर यूनानी दवाइयां में भरपूर डिमांड बढ़ रही है स्थानीय स्तर पर उन्नत किस्म का उपयोग अब बढ़ेगा. इसे मारवाड़ क्षेत्र में औषधीय खेती का विस्तार होगा जो रोजगार सृजन करेगी और रेगिस्तान अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएगा.

डॉ शंकरलाल सियाक एडिशनल डायरेक्टर कृषि विभाग नागौर ने बताया कि राज्य सरकार को हम प्रपोज तैयार करके इस औषधीय फसल को लेकर भेजेंगे. हमारा कृषि परिवेशक जो इसकी लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है और तीसरे चौथे दिन इसकी पूरी तरह जानकारी ले रहे हैं. पारूल चौधरी की देन से जिस पौधे को लोग कचरा समझते थे. हजारों साल से इस पौधे का उपयोग कचरे की तरह करते थे. मगर अब इस पौधे की बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली. यह एक औषधि फसल है और इसको जीआई टैग मिलने से अब किसान नागौर के इसकी खेती करेंगे.

किसान वेद प्रकाश सांखला ने कहा कि मैं हैदराबाद में दुकानदारी का काम करता था. एक बार मैं नागौर आया उस दौरान मैं अपने निजी रिश्तेदार से मिलने उनके गांव गया, तो उन्होंने मेरा वजन देखकर कहा कि यह अश्वगंधा की पत्तियां हैं आप इनको रोजाना खाया करें. उसके बाद मैं रोजाना खाना शुरू किया तो मेरा वजन धीरे-धीरे कम होना शुरू हो गया और शरीर से थकान भी दूर होने लगी.

नागौरी अश्वगंधा में नहीं होती कोई बीमारी

डॉ राजदीप मूंडियाडा (कृषि वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र नागौर) ने कहा कि अभी हाल ही में नागौरी अश्वगंधा को भारत सरकार ने जीआई टैग दिया हैं यह बड़े गर्व की बात हैं. जब हम यहां आएं और सुना कि अश्वगंधा जो की हजारों साल पुराना एक औषधि फसल है. इस फसल का महत्व यहां के किसान समझ ही नहीं पाए लेकिन हमने पिछले साल से इसका रिसर्च ट्रायल पर किया, तब हमने देखा कि वास्तव में नागौरी अश्वगंधा क्यों प्रसिद्ध है. हमने गुजरात और अन्य जगह का अश्वगंधा देखा उससे यह बेहतर है क्योंकि इसकी जड़े जो की खूबसू घर में रखी हो तो करीब 100 मीटर तक आ जाती हैं. दूसरी बड़ी बात कंटेंट जो अल्कलॉइड्स और सैफोनिन बड़ी मात्रा में पाया जाता है. इस कंटेंट की वजह से ही इसको जीआई टैग मिला है.  इस फसल में हमने कोई ज्यादा बीमारी नहीं देखी है. उन्होंने कहा कि अब नागौर ही नहीं पूरे भारत में किसानों को इसकी खेती की ट्रेनिंग दी जाएगी.

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