महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या का खौफनाक सच: 54 महीनों में 13,928 किसानों ने की खुदकुशी, RTI में हुआ खुलासा

महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या का खौफनाक सच: 54 महीनों में 13,928 किसानों ने की खुदकुशी, RTI में हुआ खुलासा

महाराष्ट्र में RTI से खुलासा हुआ है कि जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 13,928 किसानों ने आत्महत्या की है, यानी राज्य में हर दिन औसतन 8 से अधिक किसान जान दे रहे हैं. RTI कार्यकर्ता जीतेंद्र घाडगे का आरोप है कि सरकार जिलावार आंकड़े छिपाने की कोशिश कर रही है.

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किसान आत्महत्या का खौफनाक सच, 54 महीनों में 13,928 किसानों ने की खुदकुशीमहाराष्ट्र में किसान आत्‍महत्‍या के मामलों में बढ़ोतरी (AI जनरेटेड इमेज)

महाराष्ट्र में कर्ज और आर्थिक संकट से जुड़ी आत्महत्याओं का गंभीर मुद्दा एक बार फिर सामने आया है. लातूर जिले में चार निजी वित्तीय संस्थानों से लिए गए कर्ज और बढ़ते ब्याज से परेशान 28 वर्षीय युवक दत्ता सूर्यकांत कुंभार ने 27 अक्टूबर 2026 को कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. पुलिस को घटनास्थल से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें युवक ने कर्ज की किस्तें चुकाने के दबाव और आर्थिक परेशानियों का उल्लेख किया है.

यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 54 महीनों में 13,928 किसानों ने आत्महत्या की. RTI कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे ने किसान आत्महत्याओं के आंकड़ों में पारदर्शिता और प्रभावित परिवारों को पर्याप्त सहायता दिए जाने की जरूरत पर सवाल उठाए हैं.

लातूर में किसान ने की आत्महत्या

जानकारी के मुताबिक, मृतक दत्ता सूर्यकांत कुंभार लातूर जिले की शिरूर अनंतपाल तहसील के रानी अंकुलगा गांव के निवासी थे. उन्होंने चार वित्तीय संस्थानों से लगभग 6 लाख 20 हजार रुपये का कर्ज लिया था. कर्ज पर बढ़ते ब्याज और EMI चुकाने के दबाव के कारण वह परेशान थे.

बताया जा रहा है कि 27 अक्टूबर को शाम करीब 5 बजे उन्होंने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए शिरूर अनंतपाल के अस्पताल भेज दिया. पुलिस ने घटनास्थल से सुसाइड नोट बरामद किया है. मामले की आगे की जांच शिरूर अनंतपाल पुलिस कर रही है.

बरामद सुसाइड नोट में दत्ता कुंभार ने खुद को कर्ज में डूबा हुआ बताया है. नोट के मुताबिक, उन्होंने इक्विटास बैंक, रिंग ऐप, HDB बैंक की निलंगा शाखा और श्रीराम फाइनेंस से कर्ज लिया था.

उन्होंने कथित तौर पर लिखा कि सूखे की स्थिति के कारण वह आर्थिक संकट में फंस गए थे और कर्ज की EMI चुकाने को लेकर उन्हें परेशानी हो रही थी. नोट में उन्होंने सरकार से अपने परिवार को परेशान नहीं किए जाने, कर्ज माफ करने और परिवार को आर्थिक मुआवजा देने की अपील भी की है.

दत्ता कुंभार अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे. उनके परिवार में मां, पत्नी और दो बच्चे हैं. उनकी मौत के बाद परिवार के सामने आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो गया है.

यह घटना ग्रामीण इलाकों में कर्ज, खेती से जुड़ी आर्थिक अनिश्चितता और परिवारों की वित्तीय सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है. इस घटना के बीच RTI के जरिए सामने आए महाराष्ट्र में किसान आत्महत्याओं के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं.

सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, राज्य में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 54 महीनों में 13,928 किसानों ने आत्महत्या की है, यानी हर दिन 8 से ज्यादा किसान.

यह जानकारी यंग व्हिसलब्लोअर्स फाउंडेशन के कार्यकर्ता जीतेंद्र घाडगे द्वारा मांगी गई थी. हैरानी की बात यह है कि ये आंकड़े भी पहली बार में नहीं, बल्कि पहली अपील के बाद और सिर्फ कुल संख्या के रूप में दिए गए. जिलावार और माहवार ब्योरा देने से साफ इनकार कर दिया गया.

आंकड़े देने से इनकार, सरकार पर आरोप

घाडगे का कहना है, "पिछले 10 वर्षों में यह पहली बार है जब राहत एवं पुनर्वास विभाग ने जिलावार किसान आत्महत्या के आंकड़े देने से मना किया है."

विभाग की ओर से दी गई एकमुश्त तालिका के मुताबिक,

  • कुल मामले:13,928
  • सरकारी मदद के लिए पात्र: 8,145 मामले
  • अपात्र घोषित कर खारिज: 4,042 मामले (लगभग 10 में से 3)
  • जांच के अधीन: 941 मामले
  • मदद मिली: 8,145 पात्र परिवारों में से सिर्फ 7,850 परिवारों को 1 लाख रुपये की सहायता मिली, जबकि 295 परिवार आज भी इंतजार में हैं.

इसका मतलब है कि लगभग 30% शोकाकुल परिवारों को सरकार से एक रुपया भी नहीं मिला.

RTI कार्यकर्ता ने खोली पोल

जीतेंद्र घाडगे ने जिलावार और माहवार आंकड़ों के लिए RTI दाखिल की थी. 24 जुलाई को जन सूचना अधिकारी ने जवाब दिया कि "जानकारी प्रत्येक जिलाधिकारी कार्यालय के पास है, वहीं से लें", जबकि यही विभाग पिछले कई सालों से जिलावार आंकड़े देता आ रहा है.

इसके बाद 18 अगस्त को घाडगे ने प्रथम अपील दाखिल की. 8 सितंबर को सुनवाई हुई और तब जाकर सिर्फ पूरे राज्य की एक टेबल थमा दी गई. जिलावार विवरण, जो उनकी याचिका का मुख्य आधार था, देने से इनकार कर दिया गया. घाडगे का आरोप है कि यह इनकार वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के दबाव में किया गया.

विशेषज्ञों का मानना है कि जिलावार आंकड़ों के बिना यह पता लगाना नामुमकिन है कि संकट किस जिले में सबसे ज्यादा गहरा है, कौन सी सरकारी योजना फेल हो रही है और राहत सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों तक पहुंच भी रही है या नहीं.

मृत किसानों की बढ़ती संख्या निराशाजनक

जीतेंद्र घाडगे ने कहा, "मैंने इस मुद्दे पर पत्र लिखते हुए, RTI दाखिल करते हुए एक दशक बिता दिया है. मैं अधिकारियों से कहता रहा हूं कि आंकड़ों से परे देखिए, हर मौत के पीछे एक इंसान है. अपनी जान लेने वाला हर किसान एक ऐसा परिवार छोड़ जाता है जिसकी दुनिया रातों-रात तबाह हो जाती है. कर्ज की जिम्मेदारी विधवा पर आ जाती है जो सोचती है कि बच्चों को कैसे खिलाएगी, और माता-पिता को ऐसे दुख के साथ जीना पड़ता है जिसे कोई मुआवजा नहीं मिटा सकता."

उन्होंने आगे कहा, "सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि इतने सालों बाद भी हम बुनियादी पारदर्शिता के लिए लड़ रहे हैं. अगर सरकार हर त्रासदी को नहीं रोक सकती, तो कम से कम यह सुनिश्चित करे कि कोई भी पीड़ित परिवार बेसहारा न छूटे. मृत किसानों की बढ़ती संख्या निराशाजनक है, लेकिन आज तो आंकड़ों को भी छुपाया जा रहा है."

घाडगे ने सरकार को पत्र भी लिखे और‌ ‍पत्र में उन्होंने दो बड़े सुझाव दिए थे-

  • जिन परिवारों के मुआवजे के दावे खारिज हो जाते हैं, उन्हें गोपीनाथ मुंडे शेतकरी अपघात विमा योजना के तहत कवर किया जाए, ताकि हर प्रभावित परिवार को कारण की परवाह किए बिना 2 लाख रुपये मिले.
  • योजनाओं का लाभ सभी किसानों में बांटने के बजाय संकटग्रस्त परिवारों पर लक्षित किया जाए. इसके लिए सामाजिक सेवा पृष्ठभूमि वाले लोगों की तालुका-स्तरीय समितियां बनाई जाएं, जो संकटग्रस्त परिवारों की पहचान कर उन्हें हरा राशन कार्ड जारी करें और सारी योजनाएं उसी के जरिए पहुंचाई जाएं.

मुख्यमंत्री कार्यालय ने एक मिनट के भीतर ईमेल मिलने की पुष्टि भी की और उसे कृषि विभाग को भेज दिया, लेकिन घाडगे का कहना है कि आज तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.

उनके पत्र के तीन साल बाद राज्य के अपने आंकड़े बताते हैं कि संकट जस का तस बना हुआ है, और अब तो यह सवाल भी अनुत्तरित है कि यह संकट सबसे ज्यादा कहां गहरा है.(दीपेश डी. त्रिपाठी की रिपोर्ट)

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