आईसीएआर-एएसआरबी का डेटा डिलीट होना क्या कोई साजिश है. कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और उससे संबंधित भर्तियां करने वाले कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड (ASRB) का डाटा डिलीट होना कोई सामान्य बात नहीं है. इसके तार भर्तियों में अनियमितता से जोड़े जा रहे हैं. इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो पत्र लिखा गया है उसमें कृषि ज्ञान प्रबंधन निदेशालय (DKMA) में प्रोजेक्ट डायरेक्टर के तौर पर हुई डॉ. अनुराधा अग्रवाल की नियुक्ति और उसके बाद ASRB में मेंबर (क्रॉप साइंसेज) के पद के लिए शॉर्टलिस्ट करके करवाए गए उनके इंटरव्यू का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है. प्रधानमंत्री को यह पत्र वेणुगोपाल बदरवाड़ा ने लिखा है, जो आईसीएआर गवर्निंग बॉडी के पूर्व सदस्य रह चुके हैं.
सालाना लगभग 10,000 करोड़ रुपये के बजट वाले ICAR में फैले भ्रष्टाचार और इससे जुड़े संस्थानों में होने वाली भर्तियों और नियुक्तियों में अनियमितता, भाई-भतीजावाद और क्षेत्रवाद के मुद्दे पर बदरवाड़ा मुखर हैं. उन्होंने कहा है कि डॉ. अनुरोधा अग्रवाल नॉन-एग्रीकल्चर डिग्री होल्डर हैं. ICAR और ASRB में अग्रवाल की तेजी से होती तरक्की चिंता पैदा कर रही है. खासतौर पर तब जब कथित साइबर अटैक के बाद जरूरी रिक्रूटमेंट फाइलें डिलीट हो गईं हैं. बदरवाड़ा ने बताया कि डॉ. अग्रवाल के पास एग्रीकल्चर में एक भी डिग्री नहीं है, फिर भी उन्हें ASRB में मेंबर (क्रॉप साइंसेज) के पद के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया और इंटरव्यू लिया गया. उन आरोपों पर हमने डॉ. अग्रवाल से बात की तो उन्होंने सिर्फ "नो कमेंट" कहा. उनका बायोडाटा देखने पर पता चलता है कि उनके पास बॉटनी की डिग्री है.
बदरवाड़ा ने कहा कि कथित साइबर अटैक के बाद जो सेलेक्शन रिकॉर्ड खत्म हो गए हैं उसमें डॉ. अग्रवाल के पिछली चयन प्रक्रिया से जुड़ी सभी डिजिटल फाइलें भी शामिल हैं. जिसमें DKMA में प्रोजेक्ट डायरेक्टर के तौर पर उनकी नियुक्ति शामिल है. यह नियुक्ति उन फाइलों में थी जिन्हें साइबर अटैक के दौरान "आसानी से मिटा दिया गया." उसमें एलिजिबिलिटी असेसमेंट, मार्कशीट, इंटरव्यू की कार्रवाई, इवैल्यूएशन रिपोर्ट और विजिलेंस नोट्स शामिल होंगे.
पत्र में आरोप लगाया गया है कि डॉ. अग्रवाल के सेलेक्शन डिटेल्स को जानबूझकर डिलीट किया गया है. डाटा डिलीट करना सेलेक्टिव था. सिर्फ सेंसिटिव रिक्रूटमेंट फाइलें ही गायब की गईं. यह कोई एक्सीडेंट नहीं है. यह जानबूझकर सबूतों को नष्ट करना है.” वेणुगोपाल का कहना है कि डॉ. अग्रवाल की प्रोजेक्ट डायरेक्टर–DKMA के तौर पर प्रमोशन में मैनिपुलेशन किया गया था. मौजूदा डायरेक्टर का कार्यकाल पूरा होने से पहले नया सेलेक्शन करने का कोई मकसद नहीं था, सिवाय इसके कि उन्हें एक ऐसी पोजीशन पर फास्ट-ट्रैक किया जा सके जो बाद में ASRB मेंबर के लिए उनकी कैंडिडेटशिप को सही ठहरा सके. “ICAR में बहुत टैलेंट है. अनुराधा अकेली नहीं हैं. DKMA के प्रोजेक्ट डायरेक्टर के तौर पर उनका सेलेक्शन करने में जल्दबाजी करने का कोई जस्टिफिकेशन नहीं था.”
वह चेतावनी देते हैं कि खेती-बाड़ी की डिग्री न रखने वाली किसी महिला को मेंबर (क्रॉप साइंसेज) के पद पर आगे बढ़ाना और साथ ही उसकी सिलेक्शन फाइलें मिटाना, साफ तौर पर हितों का टकराव पैदा करता है, जो रिक्रूटमेंट पाइपलाइन की प्री-प्लानिंग और स्ट्रक्चरल कब्ज़ा करने का इशारा करता है. डोमेन की नाकाबिलियत साइंटिफिक ईमानदारी को खतरे में डालती है. “दुनिया का कोई भी भरोसेमंद एग्रीकल्चरल रिसर्च सिस्टम डोमेन से बाहर के लोगों को डोमेन-एक्सपर्ट चुनने की इजाज़त नहीं देता. यह इंस्टीट्यूशनल बेवकूफी है.”
वह चेतावनी देते हैं कि इस तरह की नियुक्तियां असली साइंटिस्ट का हौसला तोड़ती हैं और पसंदीदा लोगों की पाइपलाइन को बढ़ावा देती हैं, जिससे भारत के एग्रीकल्चरल रिसर्च इकोसिस्टम को लंबे समय तक नुकसान होता है. वह इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि डॉ. अग्रवाल की फाइलों का गायब होना कोई टेक्निकल गड़बड़ी नहीं है, बल्कि ICAR और ASRB के अंदर सिस्टम के गिरने का एक लक्षण है.
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