US ट्रेड डील में खेती की सीमा तय, मक्का-सोयाबीन पर भारत का ‘नो एंट्री’

US ट्रेड डील में खेती की सीमा तय, मक्का-सोयाबीन पर भारत का ‘नो एंट्री’

भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते में टैरिफ कटौती के बदले खेती को लेकर कड़ी सीमाएं तय की गई हैं. भारत के जीएम फसलों पर प्रतिबंध, मक्का-सोयाबीन में आत्मनिर्भरता और करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका के चलते अमेरिकी कृषि उत्पादों को सीमित ही पहुंच मिलने के संकेत हैं, जबकि बादाम-सेब जैसे उत्पादों पर रियायत संभव मानी जा रही है.

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US ट्रेड डील में खेती की सीमा तय, मक्का-सोयाबीन पर भारत का ‘नो एंट्री’इंडिया-यूएस ट्रेड डील

भारत और अमेरिका ने एक व्यापार समझौता किया है, जिसके तहत भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया जाएगा, जिसके बदले में नई दिल्ली रूसी तेल की खरीद बंद कर देगा और व्यापार में आ रही रुकावटों को कम करेगा. हालांकि अभी यह डील प्रस्तावित है और दस्तखत होने के बाद ही पूरी जानकारी सामने आ पाएगी.

दोनों पक्षों ने समझौते की मोटी-मोटी बातें साझा की हैं, लेकिन डिटेल्स नहीं. शुरुआती संकेतों से पता चलता है कि भारत अमेरिका को अपने कृषि बाजार तक केवल लिमिटेड पहुंच देगा. 

क्या भारत अमेरिकी मक्का, सोयाबीन या सोयामील पर टैरिफ कम करेगा?

भारत में जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) फसलों पर प्रतिबंध है, अपवाद में कपास को छोड़ दें तो. ऐसे में अमेरिका से आयातित कृषि उत्पादों जैसे मक्का, सोयाबीन और सोयामील पर टैरिफ कम करने की संभावना नहीं है क्योंकि वह लाखों छोटे किसानों की रक्षा करना चाहता है जो कम आय पर अपनी जिंदगी चलाते हैं.

अमेरिका मुख्य रूप से जीएम मक्का और सोयाबीन का उत्पादन करता है, जिससे भारत में उसे बाजार मिलना मुश्किल है. अगर किसी तरह उसे एक्सेस मिलता भी है तो उसका दायरा बहुत कम होगा. भारत का पड़ोसी देश चीन, अमेरिका से बड़ी मात्रा में सोयाबीन और मक्का खरीदता है. लेकिन भारत ऐसा नहीं करता क्योंकि उसके पास सरप्लस उत्पादन मौजूद है. इन दोनों फसलों की बाहरी जरूरत भारत को न के बराबर है.

भारत के पास मक्का और सोयामील का बड़ा स्टॉक है. यह सोयामील सोयाबीन की पेराई करने और तेल निकालने के बाद बचा हुआ ऐसा प्रोडक्ट है जिसका पशु चारे में बहुत इस्तेमाल होता है. भारत में सोया तेल निकालने का काम बड़े स्तर पर होता है, लेकिन इतना भी नहीं होता जिससे कि घरेलू मांग पूरी की जा सके. 

इसका रिजल्ट है कि भारत सोया तेल का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है, जो मुख्य रूप से ब्राजील, अर्जेंटीना और अमेरिका से आपूर्ति करता है. भारत सोया तेल की खरीद अमेरिका से करता है, लेकिन सोयाबीन की खरीद नगण्य बनी हुई है.

भारत में अपने खुद के बनाए इथेनॉल की भी पर्याप्त आपूर्ति है, जो मक्का, चावल और गन्ने से बनाया जाता है. इसे देखते हुए इथेनॉल उत्पादन के लिए भी अमेरिका से मक्का लेने की कोई संभावना नहीं दिखती.
 
अमेरिका ने भारत के डेयरी बाजार तक अधिक पहुंच के लिए दबाव डाला है, जिसमें लंबे समय से बहुत अधिक इंपोर्ट ड्यूटी लगती रही है. यह ड्यूटी इतनी अधिक है कि अमेरिका का डेयरी प्रोडक्ट भारत के बाजारों में नहीं टिक पाएगा. भारत में करोड़ों किसान पशुपालन और डेयरी पर आश्रित हैं, इसे देखते हुए सरकार किसानों की आजीविका के लिए डेयरी क्षेत्र को बातचीत से बाहर रखने की संभावना है.

भारतीय अधिकारियों ने तर्क दिया है कि भारत में पशुपालन का औसत आकार प्रति किसान केवल दो से तीन जानवर है, जबकि अमेरिका में सैकड़ों हैं. यह अंतर छोटे भारतीय किसानों को नुकसान में डाल सकता है.

कृषि में भारत और कहां रियायत दे सकता है?

'रॉयटर्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत बादाम, अखरोट, पिस्ता, सेब, नाशपाती और जामुन जैसे कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करने या आयात कोटा की अनुमति देने पर तैयार हो सकता है. सरकार फलों और सब्जियों, शराब और स्पिरिट्स के लिए ट्रेड बैरियर भी कम कर सकती है क्योंकि ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनसे भारतीय किसानों को नुकसान नहीं होता है.

चूंकि भारत पहले से ही बादाम, अखरोट, पिस्ता, सेब, नाशपाती और बेरी के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए इन चीजों पर अगर इंपोर्ट ड्यूटी घटती भी है, तो इसके बारे में लोगों को समझाना भारत सरकार के लिए आसान होगा. इसी तरह, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भारतीय बाजारों तक पहुंच को अमेरिकी किसानों के लिए एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर सकता है.

भारत के लिए कृषि संवेदनशील मुद्दा क्यों

हालांकि कृषि क्षेत्र भारत की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में मामूली 15% का योगदान देता है, लेकिन यह देश की 1.4 अरब आबादी में से लगभग आधे लोगों का पेट पालता है. लगभग 80% भारतीय किसान छोटे किसान हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर या उससे कम जमीन है, जिससे उनकी आय सीमित हो जाती है. लेकिन किसान एक प्रभावशाली वोट बैंक बनाते हैं, और लगातार सरकारों ने लाखों किसानों को नाराज करने से बचने की कोशिश की है.

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