ICAR wheat new varietyआईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने कहा है कि, "हम ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जिसमें 25 फीसदी उर्वरक कम लगे और उपज पोषक तत्वों से भरपूर हो." आत्मनिर्भर भारत और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम है. हाल ही में डॉ. जाट ने करनाल स्थित गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) और केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) का दौरा किया. उन्होंने वैज्ञानिकों को ऐसी तकनीकें विकसित करने के निर्देश दिए जिससे खेती की लागत कम हो और किसानों का मुनाफा बढ़े.
डॉ. जाट ने भरोसा जताया कि इस साल गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार होगी, जो न केवल भारत की खाद्य सुरक्षा पक्की करेगी बल्कि हम दुनिया की मदद करने के लिए भी तैयार रहेंगे. आज के दौर में बदलता मौसम खेती के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है. डॉ. जाट ने बताया कि वैज्ञानिक अब ऐसी फसलें तैयार कर रहे हैं जो भीषण गर्मी, सूखा या अचानक होने वाली बारिश को झेल सकें. इसमें जैविक नाइट्रिफिकेशन अवरोधन (BNI) तकनीक बहुत खास है. इसकी मदद से पैदावार कम किए बिना यूरिया जैसे खादों की खपत को 25 से 30 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है. इससे देश के किसानों के लगभग 2,000 करोड़ रुपये हर साल बच सकते हैं. साथ ही, गेहूं की 55 ऐसी 'बायो-फोर्टिफाइड' किस्में लाई गई हैं जो आयरन, जिंक और प्रोटीन से भरपूर हैं, जिससे देश की सेहत भी सुधरेगी.
खेती के पुराने तरीकों को बदलकर अब 'संरक्षण खेती' (Conservation Agriculture) पर ध्यान दिया जा रहा है. साल 2009 से करनाल में चल रहे एक बड़े प्रोजेक्ट के हैरान करने वाले नतीजे सामने आए हैं. इस नई पद्धति को अपनाने से सिंचाई के पानी में 85 प्रतिशत तक की भारी बचत देखी गई है. साथ ही, ट्रैक्टर चलाने में लगने वाले डीजल के खर्च में 51 प्रतिशत की कमी आई है.
सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरीके से पराली जलाने की समस्या 95 प्रतिशत तक खत्म हो गई है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में 46 प्रतिशत की गिरावट आई है. पिछले 15 सालों के डेटा से पता चला है कि इस तकनीक से मिट्टी के भीतर रहने वाले मित्र सूक्ष्मजीवों की संख्या और कार्बन की मात्रा दोगुनी हो गई है, जिससे खेत पहले से ज्यादा उपजाऊ बन गए हैं.
डॉ. जाट ने गेहूं को लगने वाली बीमारियों, खासकर 'रस्ट' की निगरानी प्रणाली की भी समीक्षा की. भारत में अब एक ऐसा नेटवर्क तैयार है जिसमें 30 से ज्यादा संस्थान और कृषि विज्ञान केंद्र मिलकर लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर जमीन की निगरानी करते हैं. इससे किसानों को बीमारी आने से पहले ही चेतावनी मिल जाती है. साथ ही, वैज्ञानिक अब जंगली गेहूं की किस्मों का उपयोग करके 'प्री-ब्रीडिंग' कर रहे हैं ताकि भविष्य के लिए ऐसी सुपर-फसलें तैयार की जा सकें जिन पर किसी भी बीमारी या खराब मौसम का असर न हो. इसके अलावा, जौ (Barley) की खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. जौ एक ऐसी फसल है जिसे बहुत कम पानी और खाद चाहिए होती है और बाजार में इसकी मांग पशु आहार के साथ-साथ बिस्किट और हेल्थ ड्रिंक्स बनाने वाली कंपनियों में बहुत तेजी से बढ़ रही है.
खेती की इन आधुनिक तकनीकों जैसे 'जीरो टिलेज' यानी बिना जुताई के बुवाई और मशीनीकृत खेती से न केवल समय बच रहा है, बल्कि खेती की लागत में 70-75 प्रतिशत तक की बचत हो रही है. डॉ. जाट ने कहा कि आईसीएआर का लक्ष्य सिर्फ लैब में रिसर्च करना नहीं है, बल्कि उस जानकारी को खेत तक पहुंचाना है. इन नवाचारों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और गांवों के युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं. वैज्ञानिक समझ और किसानों की मेहनत के मेल से भारत एक ऐसी कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है जो न केवल टिकाऊ है.
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