चीनी उद्योग ने उठाई सही कीमत देने की मांगचीनी उद्योग भारत सरकार के सामने लगातार चीनी उत्पादन और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य के अंतर को लेकर अपनी मांगें रख रहा है. मौजूदा कीमतों को लेकर चीनी उद्योग ने चिंता जताई है. इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने कहा कि प्रमुख उत्पादक राज्यों में एक्स-मिल चीनी कीमतें अभी उत्पादन लागत से नीचे बनी हुई हैं. अगर मिलों को चीनी का उचित मूल्य नहीं मिला तो गन्ना किसानों को समय पर भुगतान करना चुनौती बन सकता है. साथ ही उद्योग ने इथेनॉल कीमतों में संशोधन की जरूरत भी दोहराई है.
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने कहा कि प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में एक्स-मिल चीनी कीमतें अभी उत्पादन लागत से नीचे बनी हुई हैं. उत्तर प्रदेश में एक्स-मिल कीमत करीब 41 से 41.50 रुपये प्रति किलोग्राम और महाराष्ट्र में लगभग 39 रुपये प्रति किलोग्राम बताई जा रही है, जबकि उत्पादन लागत करीब 42 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास आंकी जा रही है. ISMA ने कहा कि इस अंतर को कम किए बिना वित्तीय संतुलन बनाना आसान नहीं होगा.
ISMA ने कहा कि कि जब भी गन्ने का एफआरपी (फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस) बढ़ाया जाता है तो उसी अनुपात में चीनी से होने वाली प्राप्ति पर भी विचार होना चाहिए. उनका तर्क है कि गन्ने की लागत बढ़ने का सीधा असर मिलों की संचालन क्षमता और किसानों के भुगतान चक्र पर पड़ता है. ऐसे में मूल्य संरचना में संतुलन जरूरी है.
उद्योग के अनुमान के मुताबिक, 2025-26 चीनी सीजन के अंत तक देश में करीब 42 से 43 लाख टन क्लोजिंग स्टॉक रह सकता है. पिछला सीजन लगभग 50 लाख टन ओपनिंग स्टॉक के साथ शुरू हुआ था. हालांकि, आपूर्ति को लेकर फिलहाल किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है, क्योंकि अक्टूबर के तीसरे सप्ताह से नई आवक बाजार में आने लगेगी.
चीनी उद्योग ने इथेनॉल खरीद कीमतों में संशोधन की जरूरत पर भी जोर दिया है. ISMA का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में गन्ने की लागत, कंवर्जन कॉस्ट और वित्तीय लागत बढ़ी है, लेकिन इथेनॉल की कीमतों में उसी अनुपात में बदलाव नहीं हुआ. इससे मिलों और डिस्टिलरी इकाइयों की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित हो रही है.
ISMA ने फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को इथेनॉल खपत बढ़ाने की दिशा में अहम कदम बताया है. साथ ही खाना पकाने के लिए इथेनॉल आधारित स्टोव को बढ़ावा देने की भी वकालत की है. उद्योग का मानना है कि इससे एलपीजी आयात पर निर्भरता घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है. (एएनआई)
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