पूसा संस्थान ने मनाया 122वां स्थापना दिवसभारतीय कृषि का हृदय कहे जाने वाले 'पूसा संस्थान' (ICAR-IARI) ने 1 अप्रैल, 2026 को अपनी स्थापना के 122 वर्ष पूरे कर लिए हैं. नई दिल्ली के डॉ. बी.पी. पाल ऑडिटोरियम में आयोजित इस भव्य समारोह में संस्थान की गौरवशाली विरासत का जश्न मनाया गया. यह केवल एक स्थापना दिवस नहीं, बल्कि उस अटूट जज्बे का सम्मान था जिसने भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है. संस्थान के निदेशक डॉ. एच. श्रीनिवास राव ने बताया कि IARI अब 'विकसित भारत 2047' के सपने को साकार करने के लिए डिजिटल तकनीक और जलवायु-अनुकूल खेती पर विशेष ध्यान दे रहा है.
शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाते हुए संस्थान ने NIRF 2025 रैंकिंग में लगातार तीसरी बार शीर्ष स्थान हासिल किया है और हाल ही में 'क्यूएस वर्ल्ड रैंकिंग 2026' में भी अपनी जगह बनाकर दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया है.
समारोह की मुख्य अतिथि दिल्ली की मुख्य मंत्री रेखा गुप्ता ने संस्थान की बेमिसाल सेवाओं की सराहना करते हुए पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और जल संकट से जूझ रही है, तब पूसा संस्थान द्वारा दिल्ली को हरा-भरा बनाने और जल संचयन के लिए उठाए गए कदम प्रेरणादायक हैं. उन्होंने याद दिलाया कि एक समय देश अनाज के लिए दूसरों पर निर्भर था, लेकिन वैज्ञानिकों की मेहनत से आज हम आत्मनिर्भर हैं.
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मिट्टी की सेहत सुधारना और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है. वहीं विधायक, विशिष्ट अतिथि रविंदर इंद्रराज सिंहने 'ग्रीनर दिल्ली' अभियान की प्रशंसा करते हुए कहा कि सामूहिक प्रयासों से ही हम आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण दे सकते हैं.
ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने कृषि की नई दिशा को लेकर एक क्रांतिकारी विचार साझा किया. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब हमें भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि 'दवा' के रूप में देखना चाहिए, ताकि कुपोषण से लड़कर एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके. डॉ. जाट ने सुझाव दिया कि शहरों से निकलने वाले कूड़े-करकट को वैज्ञानिक तरीके से कीमती जैविक खाद में बदलकर कचरा प्रबंधन और जमीन की उर्वरता, दोनों समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. उन्होंने किसानों को संतुलित खाद के उपयोग की सलाह देते हुए कहा कि यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कम कर वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाना चाहिए. इससे न केवल खेती की लागत कम होगी, बल्कि उपभोक्ताओं को शुद्ध और पौष्टिक आहार भी मिलेगा.
स्थापना दिवस के इस अवसर पर एक विशेष प्रदर्शनी के माध्यम से संस्थान की अत्याधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन किया गया. समारोह के दौरान 'इम्प्रूव्ड क्रॉप वैरायटीज' और 'प्रिसिजन फ्लोरीकल्चर' जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी हुआ. कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण वह था जब वर्ष 2025-26 के दौरान उत्कृष्ट कार्य करने वाले वैज्ञानिकों, तकनीकी स्टाफ और मीडिया कर्मियों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया. अंत में डॉ. आर. एन. पडारिया ने सभी का आभार व्यक्त किया. इस गरिमामयी आयोजन ने स्पष्ट कर दिया कि पूसा संस्थान अपनी शानदार विरासत को सहेजते हुए आधुनिक चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार है. संस्थान का यह समर्पण न केवल किसानों की आय बढ़ाएगा, बल्कि भारत को कृषि विज्ञान के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करने की शक्ति प्रदान करेगा.
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