बिना यूरिया धान की खेतीखाद संकट के बीच आंध्र प्रदेश के किसानों ने धान की खेती में एक नायाब नुस्खा अपनाया है. ईरान-इजरायल युद्ध के बीच इस नुस्खे की बहुत चर्चा हो रही है. दरअसल, यह एक तरह का जुगाड़ू तरीका है जिसमें किसानों ने खाद, खासकर यूरिया की खपत को कम करने के लिए नई तरकीब निकाली है. इस तरकीब में किसान धान के खेत में यूरिया का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उसकी जरूरत को प्राकृतिक तरीके से पूरी करते हैं. इससे धान की खेती खाद के मामले में जीरो लागत वाली बन गई है. साथ ही, मिट्टी की सेहत से कोई खिलवाड़ भी नहीं होता. आइए जानते हैं यह देसी तरीका क्या है.
खाद की जरूरत पूरी करने वाला यह तरीका बेहद आसान और प्राकृतिक है. इसमें यूरिया में पाए जाने वाले नाइट्रोजन की जरूरत को प्राकृतिक ढंग से पूरा किया जाता है. धान में बडे़ पैमाने पर यूरिया की खपत होती है. किसान फसल की मांग से अधिक यूरिया का छिड़काव कर देते हैं जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है. मिट्टी की सेहत भी बिगड़ती है. लेकिन आंध्र प्रदेश के किसानों ने इस यूरिया को दाल के बीजों से रिप्लेस कर दिया है.
दलहन में नाइट्रोजन फिक्सेशन की क्षमता भरपूर होती है. जिस खेत में दलहन की खेती होती है, उसमें यूरिया जैसे नाइट्रोजन पोषण की जरूरत नहीं होती. दलहन फसलों की जड़ों में ऐसी क्षमता होती है जो हवा से नाइट्रोजन सोखकर उसकी जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन को जमा कर देती हैं. अगर मिट्टी में इस नाइट्रोजन की कमी हो जाए तो दलहन फसलों की फलियां स्वस्थ नहीं बनतीं, दाल के दाने पुष्ट नहीं होते. इससे निजात पाने के लिए किसान ज्यादा मात्रा में यूरिया का छिड़काव करते हैं. लेकिन यह छिड़काव अब घातक सिद्ध हो रहा है. यहां तक कि कैंसर का कारण भी.
इसे रोकने के लिए आंध्र प्रदेश के किसान खेतों में दलहन के मिक्स बीज छिड़कते हैं. इन बीजों में अरहर, मसूर, मूंग, उड़द, मटर आदि शामिल हैं. इसमें भी सटीक नियमों का पालन किया जाता है. आंध्र प्रदेश के साथ तेलंगाना में भी इस तरकीब का इस्तेमाल हो रहा है. इन दोनों राज्यों में धान की खेती मुख्य रूप से खरीफ (जून-जुलाई) और रबी (नवंबर-दिसंबर) दोनों मौसमों में की जाती है. खरीफ की रोपाई मॉनसून के साथ जून-जुलाई में होती है, जबकि रबी फसल की बुवाई नवंबर के आसपास होती है. राज्य में धान की खेती के लिए 15 मई से 20 जून तक नर्सरी तैयार करना सबसे उपयुक्त माना जाता है.
जिस खेत में धान की नर्सरी को रोपा जाना है, उस खेत में दो महीने पहले किसान दलहन के बीजों को छिड़क देते हैं. इससे धान की रोपाई से पहले मिट्टी में नाइट्रोजन की अच्छी मात्रा जमा हो जाती है. फिर उस खेत में हल चलाकर धान की रोपाई कर दी जाती है. इसके दो फायदे हैं. एक, मिट्टी में नाइट्रोजन की उचित मात्रा जमा हो जाती है जिससे यूरिया की खपत शून्य होती है. दूसरा, खेत में ही दलहन के पौधे छोड़ देने से मल्चिंग का काम पूरा हो जाता है जिससे खेत में नमी की मात्रा बनी रहती है. धान की खेती में चूंकि पानी की अधिक जरूरत होती है, इसलिए मल्चिंग की मदद से भाप के रूप में पानी की बर्बादी रोक दी जाती है.
यह ऐसी तकनीक है जो किसानों के साथ साथ पर्यावरण को भी फायदा पहुंचा रही है. यूरिया पर होने वाला किसान का खर्च बच रहा है, धान में रसायनों का अंश नहीं जाता, यूरिया से होने वाला वायु प्रदूषण न के बराबर है, मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की मौजूदगी बनी रहती है आदि. ये ऐसे फायदे हैं जिसे कोई किसान नकार नहीं सकता, तभी आंध्र प्रदेश की इस तरकीब की चर्चा चारों ओर हो रही है. अधिक से अधिक किसानों को इस तरीके को अपनाने की सलाह दी जा रही है. आंध्र प्रदेश में यह तरकीब बेहद लाभकारी साबित हुई है क्योंकि धान की खेती किसानों की लाइफलाइन है. धान की खेती के बिना आंध्र प्रदेश के किसानों की कल्पना मुश्किल है.
आंध्र प्रदेश धान उत्पादन के मामले में तीसरे स्थान पर है. यह राज्य भारत में 128.95 लाख टन चावल का उत्पादन करता है. यह चावल का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है, जो देश में उगाए जाने वाले कुल चावल का 12% हिस्सा पैदा करता है.
चावल पूरे राज्य में उगाई जाने वाली मुख्य खाद्य फसल है, जो यहां की बढ़ती आबादी को भोजन, मवेशियों को चारा और ग्रामीण लोगों को रोजगार देती है. आंध्र प्रदेश में धान मुख्य फसल है, जिसकी खेती खरीफ और रबी, दोनों मौसमों में 22 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा जमीन पर की जाती है. आंध्र प्रदेश के 13 जिले चावल का उत्पादन करते हैं, जिनमें से पश्चिम गोदावरी, पूर्वी गोदावरी, कृष्णा, गुंटूर, श्रीकाकुलम, विजयनगरम और चित्तूर प्रमुख उत्पादक हैं. असल में, पश्चिम गोदावरी, पूर्वी गोदावरी और कृष्णा—ये तीन जिले न केवल आंध्र प्रदेश के, बल्कि पूरे भारत के सबसे महत्वपूर्ण चावल पैदा करने वाले जिले हैं. पश्चिम गोदावरी और पूर्वी गोदावरी जिलों को आंध्र प्रदेश का 'चावल का कटोरा' माना जाता है.
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