8 उत्पादों को मिला GI टैग (AI- तस्वीर)हिमाचल प्रदेश के किसानों, कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों के लिए बड़ी खुशखबरी है. दरअसल, राज्य के आठ पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग के रूप में रजिस्टर्ड किया गया है. इससे इन उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी. साथ ही नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और किसानों और कारीगरों को अपनी मेहनत का बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ेगी.
हाल ही में जिन आठ उत्पादों को GI टैग मिला है, उनमें स्पीति का सीबकथॉर्न (छरमा), सलूणी का सफेद मक्का, चंबा मेटल आर्ट, सिरमौरी लोइया, किन्नौरी टोपी, मंडी की सेपुवड़ी, किन्नौरी सेब और किन्नौरी ज्वेलरी शामिल हैं. इन नए उत्पादों के जुड़ने के बाद अब हिमाचल प्रदेश के कुल 17 पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिल चुका है. ये उत्पाद राज्य की समृद्ध कृषि, संस्कृति, पारंपरिक कारीगरी और स्थानीय विरासत की पहचान माने जाते हैं.
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह राज्य सरकार के लगातार प्रयासों का परिणाम है. उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े तीन वर्षों से सरकार पारंपरिक उत्पादों को संरक्षण देने और उन्हें नई पहचान दिलाने के लिए काम कर रही है. मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की असली पहचान सुरक्षित रहेगी और बाजार में उनकी अलग पहचान बनेगी. इससे किसानों, बुनकरों, कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों की आय बढ़ेगी, साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी.
CM सुक्खू ने बताया कि राज्य सरकार चार अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी GI टैग दिलाने की दिशा में काम कर रही है. इनमें चंबा के पांगी क्षेत्र का भोट जौ, चंबा चुख, भरमौर का प्लेक्ट्रेंथस शहद और सिरमौर का अदरक शामिल हैं. उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इन उत्पादों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं.
पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव सुशील कुमार सिंगला ने बताया कि GI टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक पहचान के आधार पर कानूनी सुरक्षा देता है. इससे उस उत्पाद की बिना अनुमति नकल या गलत इस्तेमाल पर रोक लगती है. साथ ही उसकी ब्रांडिंग मजबूत होती है, बाजार में मांग बढ़ती है और निर्यात की संभावनाएं भी बेहतर होती हैं. उन्होंने कहा कि GI टैग मिलने से स्थानीय उत्पादों का मूल्य बढ़ेगा, जिससे किसानों और कारीगरों की आमदनी में सुधार होगा. इसके अलावा ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
बता दें कि इससे पहले हिमाचल प्रदेश के कुल्लू शॉल, कांगड़ा चाय, चंबा रूमाल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा पेंटिंग, हिमाचली काला जीरा, हिमाचली चुल्ली तेल, चंबा चप्पल और लाहौली बुने हुए मोजे और दस्ताने जैसे पारंपरिक उत्पादों को भी GI टैग मिल चुका है. अब नए उत्पादों के जुड़ने से हिमाचल की पारंपरिक पहचान और भी मजबूत होगी. साथ ही किसानों और कारीगरों को इसका सीधा आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today