कपास के लिए जीरो ड्यूटी की मांग क्यों? देश में खरीफ सीजन के तहत कपास की बुवाई जारी है, लेकिन इसी बीच कपास पर इंपोर्ट ड्यूटी खत्म करने की मांग ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. सूत मिलों और टेक्सटाइल उद्योग की इस मांग को किसान संगठन अपने हितों के खिलाफ बता रहे हैं और इसे एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देख रहे हैं. किसानों का कहना है कि जब वे खेतों में कपास की बुवाई कर रहे हैं, उसी समय सस्ते विदेशी कपास के आयात का रास्ता खोलने की कोशिश की जा रही है. इससे जब तक फसल बाजार में आएगी, तब तक कीमतें गिर सकती हैं और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
दरअसल, भारत में फिलहाल कच्चे कपास के आयात पर करीब 11 प्रतिशत ड्यूटी लगती है. लेकिन टेक्सटाइल उद्योग और सूत मिलों का कहना है कि देश में कपास का उत्पादन घटा है और कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे उनका उत्पादन खर्च बढ़ रहा है. 2026 की शुरुआत में कपास की कीमतों में करीब 25 प्रतिशत तक उछाल आने के बाद उद्योग जगत ने सरकार से मांग की है कि आयात शुल्क को कम किया जाए या पूरी तरह खत्म किया जाए, ताकि उन्हें सस्ते कच्चे माल मिल सकें और वे दुनिया के बाजार में अपना अस्तित्व बचाए रख सकें.
किसानों का कहना है कि यह मांग ऐसे समय उठाई गई है, जब वे कपास की बुवाई कर रहे हैं. अगर सरकार इस पर रजामंदी देती है, तो सस्ता विदेशी कपास बाजार में आ जाएगा और घरेलू कीमतों में गिरावट आएगी. इससे किसानों को MSP से भी कम दाम मिलने का खतरा होगा. किसानों के मुताबिक, यह स्थिति उन्हें कपास की खेती से दूर कर सकती है.
कपास किसानों को 2025 की स्थिति अभी भी याद है, जब सरकार ने अस्थायी रूप से आयात शुल्क खत्म कर दिया था. किसान संगठनों का आरोप है कि उस फैसले का बड़ा नुकसान उन्हें उठाना पड़ा. इंपोर्ट ड्यूटी खत्म होने और बाजार में विदेशी कपास आने से कीमतें गिर गईं. कपास का भाव करीब 6000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया जबकि MSP 10,075 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित था.
किसान नेताओं का दावा है कि उस समय किसानों को 36,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ था.
उस समय के हालात पर नजर डालें तो सूत मिलों और टेक्सटाइल कंपनियों को सस्ता कच्चा माल मिला और व्यापारियों को भी फायदा हुआ, लेकिन किसानों को घाटा उठाना पड़ा. यहां तक कि कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) को भी नुकसान हुआ क्योंकि बाजार में कम कीमत होने के कारण उसका स्टॉक नहीं बिक पाया.
इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार फिलहाल विचार कर रही है. केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय को यह तय करना है कि किसानों के हितों की रक्षा की जाए या उद्योग को राहत दी जाए. बताया जा रहा है कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी इस मुद्दे पर चर्चा की है और कीमतों को स्थिर रखने के उपायों पर विचार किया जा रहा है. आयात ड्यूटी हटाने के साथ-साथ कपास के निर्यात पर नियंत्रण जैसे विकल्पों पर भी चर्चा हो रही है.
इस साल कपास किसानों के सामने मौसम की चुनौती भी कम नहीं है. ला नीना की आशंका और कमजोर मॉनसून का खतरा तलवार की तरह माथे पर लटक रहा है. ऐसे में अगर उत्पादन प्रभावित होता है और कीमतें भी गिरती हैं, तो किसानों की स्थिति और खराब हो सकती है.
किसान संगठनों ने इंपोर्ट ड्यूटी खत्म करने की मांग को किसान विरोधी और कॉरपोरेट हितैषी करार दिया है. उनका कहना है कि अगर सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ेगा.
ऐसे में कपास पर इंपोर्ट ड्यूटी खत्म करने की मांग ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश में कृषि और उद्योग के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. एक तरफ उद्योग को सस्ते कच्चे माल की जरूरत है, तो दूसरी तरफ किसानों की रोजी-रोटी दांव पर है. ऐसे में सरकार का फैसला बेहद अहम होगा, जो यह तय करेगा कि आने वाला समय कपास किसानों के लिए अवसर लेकर आएगा या संकट.
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