Explained: प्रोसेसिंग यूनिट नहीं, MSP भी नहीं, बिहार के मक्का किसानों का दोहरा संकट

Explained: प्रोसेसिंग यूनिट नहीं, MSP भी नहीं, बिहार के मक्का किसानों का दोहरा संकट

निर्यात बढ़ने के बावजूद बिहार के मक्का किसान बदहाली में हैं. MSP से नीचे दाम, प्रोसेसिंग यूनिट की कमी और व्यापारियों के खेल से किसानों को भारी नुकसान हो रहा है.

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Explained: प्रोसेसिंग यूनिट नहीं, MSP भी नहीं, बिहार के मक्का किसानों का दोहरा संकटबिहार में मक्का के नहीं मिल रहे सही रेट

बिहार में मक्का की खेती और मक्का उगाने वाले किसान बदहाली में हैं. देश से मक्के के निर्यात में भले उछाल है, बिहार में इसका कोई फायदा नहीं दिख रहा है जबकि लाखों किसान मक्के की खेती में लगे हैं. किसान दिन-रात मेहनत करके बेहतर क्वालिटी का मक्का उगाते हैं और जब बेचने की बारी आती है तो MSP रेट तो दूर, लागत भी नहीं मिल पाती. समस्या केवल एमएसपी रेट की नहीं है, प्रोसेसिंग यूनिट की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है जिसकी मांग किसान लगातार कर रहे हैं.

सरकार पर आरोप लगाते हुए किसान बताते हैं कि प्रदेश में मक्का खरीद और प्रोसेसिंग की व्यवस्था ठीक नहीं है जिसका फायदा बाहर के व्यापारी उठाते हैं. बाहरी व्यापारी बिहार के किसानों से सस्ते में मक्का खरीद लेते हैं और अपने बाजार में महंगे रेट पर बेचकर मुनाफा कमाते हैं.

बिहार के मक्के की तस्करी?

व्यापारी बिहार का मक्का बांग्लादेश तक पहुंचाते हैं जहां पोल्ट्री फीड तैयार होता है. वही पोल्ट्र फीड बिहार में लाकर महंगे रेट पर बेचा जाता है. सरकार से किसानों की अपील है कि उन्हें व्यापारियों के मकड़जाल से जल्द आजाद किया जाना चाहिए.

सममस्तीपुर में बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की कमर्शियल खेती करने वाले किसान उमाशंकर ने बताया कि उन्हें कई साल से मक्के का एमएसपी नहीं मिला है. साल 2024 में 2100 रुपये का रेट मिला जबकि इस साल 1900-2000 रुपये क्विंटल भाव है. सरकार ने मक्के का एमएसपी 2400 रुपये तय किया है जबकि किसी भी किसान से इस भाव पर मक्के की खरीद नहीं होती. कई साल से यही सिलसिला चला आ रहा है.

असली समस्या कहां है?

गन्ने की अच्छी खेती और बंपर पैदावार के बावजूद बिहार के किसान तंगहाली में क्यों हैं? इसके दो मुख्य कारण हैं- एक तो प्रोसेसिंग यूनिट की कमी और दूसरा, बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की खेती का सिमटा हुआ दायरा. 

बिहार सरकार स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न की खेती बढ़ाने के लिए हर साल बड़ी मात्रा में बीज बांटती है. बीज बंटवारे का काम कागजों पर सफल दिखता है जबकि सच्चाई में 10 परसेंट बीज ही किसानों तक पहुंच पाते हैं. बाकी बीजों की खानापूर्ति कर दी जाती है. बीजों के कम बंटवारे के चलते बिहार में बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की खेती का दायरा नहीं बढ़ पा रहा है. किसान अब भी सामान्य मक्के की खेती पर फोकस कर रहे हैं जिसमें कमाई की संभावना कम है.

थोड़े बहुत किसान स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न की खेती करते भी हैं तो उन्हें सही रेट नहीं मिलता. कुछ प्राइवेट प्रोसेसिंग यूनिट हैं जो बहुत कम रेट लगाती हैं. स्वीट कॉर्न का भाव 9 रुपये किलो जबकि बेबी कॉर्न के लिए 40-50 रुपये किलो ऑफर किया जाता है. इससे खेती की लागत भी नहीं निकल पाती. यहां तक कि ट्रांसपोर्टेशन का खर्च भी नहीं निकलता. उससे अच्छा भाव सामान्य मक्के का मिल जाता है. यही वजह है कि बिहार के अधिकांश किसान कॉर्न से अधिक सामान्य मक्के की खेती कर रहे हैं.   

कैसे सुधरेंगे हालात?

समस्तीपुर के किसान उमाशंकर खेती के साथ कॉर्न का बिजनेस भी करते हैं. वे बताते हैं कि किसानों की हालत तभी सुधरेगी जब सरकार खुद का प्रोसेसिंग प्लांट लगाएगी या एनजीओ के मार्फत प्लांट लगेंगे. अगर निजी प्रोसेसिंग यूनिट खुलती है तो किसानों को गारंटीशुदा रेट मिले. उमाशंकर ने कहा कि किसान सामान्य मक्के से हटकर बेबी कॉर्न या स्वीट कॉर्न की खेती तभी करेगा जब उसे सही रेट मिलेगा. प्रोसेसिंग यूनिट अगर बेबी कॉर्न का दाम 80 रुपये किलो और स्वीट कॉर्न का भाव कम से कम 15 रुपये किलो दें तभी किसानों को मुनाफा होगा. तभी किसान कॉर्न की खेती में आगे आएंगे.

सरकार को क्या करना चाहिए?

बिहार के होटलों में दूसरे राज्यों के बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की सप्लाई आती है. होटलों में बेबी कॉर्न का डिब्बा महंगे रेट पर लिया जाता है जबकि बिहार का माल कोई नहीं खरीदता. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. सरकार प्रदेश के होटलों से बात करे और बिहार के कॉर्न की सप्लाई सुनिश्चित करे तो किसानों की कमाई बढ़ सकती है. जब तक किसान को सही रेट नहीं मिलेगा, तब तक वह कॉर्न की खेती में मन से नहीं लगेगा. सरकार अगर बिहार में ही प्रोसेसिंग यूनिट का जाल बिछाए तो मक्का बांग्लादेश नहीं जाएगा बल्कि लोकल मक्के से ही पोल्ट्री फीड बनेगा और किसानों की इनकम बढ़ेगी.

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