बिहार में फूड प्रोसेसिंग की संभावनाएं अपार हैंबिहार के किसान बदहाल हैं. खेती में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी आय के नाम पर कुछ नहीं मिलता. किसी-किसी फसल में तो लागत का भी टोटा है. जबकि कृषि उत्पादन के मामले में बिहार किसी भी राज्य से बहुत पीछे नहीं है. तब सवाल है कि ऐसा क्यों है? वजह है कृषि उत्पादों को बाजार नहीं मिलना. फिर एक सवाल ये भी है कि उत्पादों को बाजार क्यों नहीं मिलता? जवाब है फूड प्रोसेसिंग की भारी कमी.
खेती का मजबूत बेस होने के बावजूद बिहार का फूड प्रोसेसिंग सेक्टर ठीक से डेवलप नहीं हुआ है. ये भी कह सकते हैं कि जिस तेजी से इसे बढ़ना था, वैसा काम नहीं हुआ. इसका असर है फसल बहुत ज्यादा बर्बाद होती है. एक छोटा उदाहरण है, पपीते में 30-50% तो केले में 25% का नुकसान हर साल होता है. अमाउंट में देखें तो हर साल लगभग 4,500 करोड़ रुपये का नुकसान होता है.
इस नुकसान के लिए केवल फूड प्रोसेसिंग को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते. और भी कई रुकावटें हैं जिनमें कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर का ठीक से न होना (लगभग 120 यूनिट जो काम नहीं कर रही हैं), फाइनेंस तक सीमित पहुंच और मॉडर्न टेक्नोलॉजी अपनाने की धीमी चाल आदि. गोदाम और ट्रांसपोर्टेशन की भारी कमी से फसल कटाई के बाद बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है. एक और छोटा उदाहरण लीजिए-दूध का बड़ा प्रोड्यूसर (13,397 हजार टन सालाना) होने के बावजूद केवल 12-13 परसेंट ही प्रोसेस होता है जो पशुपालकों की आय बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधा है.
इन सभी अड़चनों पर फोकस करते हुए बिहार सरकार यदि फूड प्रोसेसिंग को मजबूत करे तो किसानों की आय बढ़ने के साथ प्रदेश का बीमारू ठप्पा भी हट सकता है. दूसरे राज्यों में रोजी-रोजगार के लिए धक्के भी नहीं खाने होंगे. पलायन रुकेगा और घर में ही रोजगार मिलेगा. कुछ मामलों में तो बिहार बाकी राज्यों से आगे है क्योंकि उसे फूड प्रोसेसिंग के लिए कच्चे माल की कमी नहीं. सब्जी से लेकर फल और अनाज से लेकर मखाना तक, यहां सबकुछ भरा पड़ा है. बस जरूरत है फूड प्रोसेसिंग की संभावनाओं को तलाशने और उस पर आगे बढ़ने की. बाकी का काम अपने आप हो जाएगा.
फल और सब्जी प्रोसेसिंग:
अनाज और फसल प्रोसेसिंग:
अन्य क्षेत्रों में संभावनाएं:
संभावनाएं अपार हैं, लेकिन उसे धरातल पर उतारने के लिए सरकारी मदद और इंसेंटिव की जरूरत होगी. इसमें सबसे बड़ी भूमिका मेगा फूड पार्क निभा सकता है जिसकी बिहार में घोर कमी है. एक मुजफ्फरपुर में है जो खास इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा देता है. इस तरह के पार्क फल, सब्जी, मखाना और मक्का बेल्ट में बनने चाहिए. मिनिस्ट्री ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज और राज्य सरकार की ओर से यूनिट लगाने, टेक्नोलॉजी अपग्रेड और स्किल डेवलपमेंट के लिए सब्सिडी दी जाती है. लेकिन इस सब्सिडी का कोई फायदा नहीं दिखता. सरकार को सब्सिडी के लिए कोई निगरानी तंत्र बनाना होगा जो वितरण से लेकर खर्च तक पर नजर रखे और खामियों को उजागर करे.
केंद्र सरकार ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का मंत्र दिया है. इसका सीधा मतलब है प्लांट या फैक्ट्री लगाने में कम से कम कागजी कार्रवाई या सरकारी दखल की जरूरत. बिहार सरकार ने इसके लिए एक सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम बना रखा है, जिसमें 7 दिनों के अंदर जमीन अलॉट होने का प्रावधान है. इसके बावजूद प्राइवेट कंपनियां बिहार के फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में उतरने से कतराती हैं. इसके लिए जरूरी है बिहार सरकार केंद्र के साथ मिलकर प्राइवेट कंपनियों के लिए आकर्षक ऑफर लाए और संभावनाओं के साथ सुविधा भी दे.
कुल मिलाकर, बिहार अगर गरीब है तो इसलिए नहीं कि संसाधन नहीं हैं. संसाधनों की भरमार है, लेकिन उसे प्रोसेस करने का कोई साधन नहीं है. फूड प्रोसेसिंग की सुविधा बढ़ जाए तो बिहार से गरीबी, पलायन, बेरोजगारी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today