भारत के मसाला व्यापार में बड़ा बदलाववित्त वर्ष 2025-26 में भारत के मसाला व्यापार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. इस साल संयुक्त राज्य अमेरिका (US) ने भारत के मसालों का सबसे बड़ा खरीदार बनकर चीन को पीछे छोड़ दिया है. लंबे समय से चीन भारत के मसालों का सबसे बड़ा खरीदार रहा था, लेकिन इस बार उसने अपनी खरीदारी में भारी कमी कर दी, जिसके कारण यह स्थिति बदल गई.
हालांकि अमेरिका शीर्ष खरीदार बन गया है, लेकिन भारत के कुल मसाला निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2025-26 में मसाला निर्यात 6.1 प्रतिशत घटकर 4,430 मिलियन डॉलर रह गया, जो पिछले वर्ष 4,722 मिलियन डॉलर था. इसका कारण वैश्विक मांग में बदलाव, व्यापारिक चुनौतियां और कुछ देशों की कम खरीदारी मानी जा रही है.
अमेरिका को भारत से मसालों का निर्यात 2025-26 में 624.35 मिलियन डॉलर तक पहुंचा. हालांकि यह पिछले वर्ष के 711.16 मिलियन डॉलर से कम है, लेकिन इसके बावजूद मूल्य के आधार पर अमेरिका सबसे बड़ा खरीदार बन गया है. अमेरिका मुख्य रूप से भारत से काली मिर्च, हल्दी और स्पाइस ओलियोरेसिन्स (spice oleoresins) का आयात करता है. इस साल हल्दी और काली मिर्च के निर्यात में बढ़ोतरी देखी गई, जबकि ओलियोरेसिन्स के निर्यात में गिरावट आई.
चीन, जो पहले भारत के मसालों का सबसे बड़ा खरीदार था, उसकी खरीदारी में इस साल भारी गिरावट दर्ज की गई है. 2024-25 में चीन ने 769.58 मिलियन डॉलर के मसाले खरीदे थे, जो 2025-26 में घटकर 518.98 मिलियन डॉलर रह गए. यह लगभग 32 प्रतिशत की गिरावट है. खासकर लाल मिर्च और जीरे की खरीद में चीन ने बड़ी कटौती की है.
व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार चीन ने अब अपने देश में ही मसालों की खेती बढ़ा दी है, जिसके कारण उसकी भारत पर निर्भरता कम हुई है. जीरे के आयात में 76 प्रतिशत की भारी गिरावट और मूल्य में 80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है. इसी तरह लाल मिर्च के निर्यात में भी कमी आई है. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन में बेहतर खेती तकनीक और अनुकूल मौसम के कारण घरेलू उत्पादन बढ़ा है, जिससे भारत से आयात कम हुआ है.
मसाला व्यापार से जुड़े जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में भी यह स्थिति बदल सकती है. यदि चीन का उत्पादन बढ़ता रहा तो भारत से मसालों की मांग और घट सकती है. वहीं अमेरिका और अन्य देशों में मांग स्थिर रहने की संभावना है. कुल मिलाकर भारत के मसाला निर्यात बाजार में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं.
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