
प्रगतिशील किसान सुरेंद्र अवाना एकीकृत खेती मॉडल से कमाई भरपूरराजस्थान में कम उपजाऊ जमीन पर खेती से कमाई कैसे की जा सकती है, यह प्रगतिशील किसान सुरेंद्र अवाना से सीखा जा सकता है. उन्होंने वैज्ञानिक सोच और कड़ी मेहनत से अपनी खेती को एक नया आयाम दिया है, जिसकी चर्चा अब राष्ट्रीय स्तर पर हो रही है. सुरेंद्र अवाना ने दिखाया है कि कैसे फसल उत्पादन और पशुपालन को एक-दूसरे के पूरक बनाकर लाभ कमाया जा सकता है. यह उन लोगों के लिए एक सबक है जो अपने पशुओं को लावारिस छोड़ देते हैं और सरकार पर दोष मढ़ते हैं. इनके मॉडल ने ये साबित किया है अगर पशुपालन को सही तरीके से खेती के साथ किया जाए तो इससे न केवल खेती की लागत कम होती है, बल्कि उपज की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में भी सुधार होता है.
सुरेंद्र अवाना, जयपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर भैराणा गांव, पंचायत बिचून, जिला दूदू के निवासी हैं. बीए करने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ खेती-बाड़ी करनी शुरू की. सुरेंद्र हमेशा जैविक खेती में विश्वास रखते थे और पिछले कुछ सालों में उन्होंने अपनी पारंपरिक खेती को ‘एकीकृत खेती मॉडल’ में बदल दिया है. आज वे देशभर में अपनी सफल खेती के लिए जाने जाते हैं. सुरेंद्र अपने 55 एकड़ के खेत में जैविक खेती के साथ एकीकृत फार्मिंग सिस्टम (IFS) का उपयोग कर रहे हैं. उन्होंने राजस्थान के सूखे खेतों में ‘एकीकृत खेती मॉडल’ अपनाया है, जिसमें कम उपजाऊ भूमि पर जलवायु के हिसाब से फसलें, बागवानी, वानिकी, और चारे के लिए उच्च प्रोटीन और मिनरल्स वाली घास और चारा फसलें उगाई जाती हैं. साथ ही गौपालन, बकरी पालन, और भेड़ पालन भी किया जाता है. इस मॉडल से फसल और बागवानी को पशुपालन से और पशुपालन को फसल बागवानी से लाभ मिलने के चलते लागत कम होती है और लाभ का दायरा बढ़ता है. सुरेंद्र की इस पद्धति से न केवल पशुओं के चारे की लागत कम हुई है, बल्कि जमीन की उर्वरता भी बढ़ी है.

सुरेंद्र अवाना ने रेगिस्तान में खेती से पैसा कमाने के लिए एकीकृत खेती का चारा वानिकी मॉडल अपनाया है, जिसमें ऐसी फसलें और पेड़-पौधे लगाए जाते हैं, जिनकी पत्तियों का उपयोग किसान अपने पशुओं के आहार के लिए कर सकें. वे लगभग सभी प्रकार की फसलों की खेती करते हैं, जिसमें 42 किस्मों के फल और विभिन्न सब्जियाँ शामिल हैं. उनके डेयरी फार्म में 300 गिर नस्ल की गायें, 5 ऊंट, दो घोड़े, 100 बकरियां और 50 भेड़ें भी शामिल हैं. फसल में बाजरा, मक्का, ज्वार और नेपियर घास को चारे के रूप में उगाया जाता है. उनके फार्म पर 24 प्रकार के बहुवर्षीय चारे (जैसे अजोला, सहजन, एलोवेरा, नीम, आदि) की उपलब्धता है, जो उनकी गायों के लिए पोषण का अच्छा स्रोत है. इससे उनका दूध उच्च गुणवत्ता का होता है. बागवानी के तहत उन्होंने आम, अमरूद, पपीता, चीकू, अनार, ड्रैगन फ्रूट, थाई एप्पल बेर, बादाम, खजूर और सेब आदि के पेड़ लगाए हैं. इसके अलावा, उन्होंने नीम, अरडू, शहतूत, पिलकन जैसे पेड़-पौधे भी लगाए हैं. औषधीय पौधों में गिलोय, तुलसी, अर्जुन, आंवला, सहजन, करंज, कचनार, लेसवा आदि भी शामिल हैं.

सुरेंद्र अवाना ने पशुओं के मल-मूत्र से जैविक खाद बनाकर अपनी भूमि की उर्वरता में सुधार किया है. इसके अलावा उन्होंने गोबर से ईंट, गमले, दीपक, लकड़ी, और पेंट आदि बनाने का काम भी शुरू किया है, जिससे उनकी आय में इजाफा हुआ है. उनका मॉडल राजस्थान के किसानों के लिए एक आदर्श बन गया है. सुरेंद्र अवाना अपने उत्पादों की सीधी मार्केटिंग करते हैं और मंडियों पर निर्भर नहीं रहते. वे अपने उत्पादों को सीधे ग्राहकों को बेचते हैं, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता के कारण उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं. उनकी सालाना टर्नओवर करोड़ों रुपये से अधिक है, जिससे उनकी मासिक आय लाखों में होती है.
सुरेंद्र ने अपनी जैविक खेती को धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती में परिवर्तित किया है और ‘एकीकृत खेती मॉडल’ को भी अपनाया है. उन्होंने अपने खेतों पर 4 तालाब बनवाए हैं, जिनमें बत्तख और मछली पालन होता है. साथ ही मधुमक्खी और मुर्गी पालन भी किया जाता है. वे अपने खेतों से निकलने वाले हर तरह के कचरे का पुन: उपयोग करते हैं. बिजली और पानी के लिए उन्होंने अपने खेतों पर 42 किलोवाट का सोलर सिस्टम भी लगाया है, जिससे उनके खर्च कम हुए हैं और आमदनी बढ़ी है.

प्रगतिशील किसान सुरेंद्र अवाना को उनकी अद्वितीय कृषि और पशुपालन प्रयासों के लिए कई बार राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है. उन्हें गिर गाय के संरक्षण के लिए ICAR, करनाल द्वारा प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा, उन्हें "IARI-फेलो फार्मर अवार्ड 2023" भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा उनकी कृषि में नवीनता और नवाचार के लिए दिया गया. सुरेंद्र अवाना न केवल खेती में अपार सफलता प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी एक मिसाल कायम कर रहे हैं. उनका योगदान सस्टेनेबल खेती और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय है.
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