पोल्ट्री किसान रवींद्र माणिकराव मेतकरमहाराष्ट्र के एक किसान ने पोल्ट्री व्यवसाय का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया है जिसका सालाना टर्नओवर करोड़ों में है. चौंकाने वाली बात ये है कि इस किसान के पास कभी कपड़े खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे. उनकी इस कामयाबी को देखते हुए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक कृषि-उद्यमी के तौर पर अपने अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित किया गया है.
अमरावती जिले के म्हसाला अंजनगांव बारी गांव के रहने वाले 57 वर्षीय रवींद्र माणिकराव मेतकर को 1 से 5 मई तक UK की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित होने वाले 'ग्लोबल रिसर्च कॉन्फ्रेंस' में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया है. इस कॉन्फ्रेंस का विषय "AI for Every Mind" (हर मन के लिए AI) है. इस कॉन्फ्रेंस का आयोजन 'ग्लोबल इकोनॉमिक फोरम' (GEF) द्वारा यूनिवर्सिटी के सहयोग से किया जा रहा है.
आयोजकों की ओर से मेतकर को भेजे गए निमंत्रण पत्र में कहा गया है, "एक भारतीय कृषि-उद्यमी के तौर पर आपके अनुभव और योगदान को देखते हुए, कॉन्फ्रेंस के दौरान होने वाली चर्चाओं और आपसी विचारों के आदान-प्रदान के लिए आपकी मौजूदगी और आपके विचार बेहद मूल्यवान होंगे."
मेतकर ने 1984 में अपने घर की छत से ही अपने पोल्ट्री फार्मिंग के व्यवसाय की शुरुआत की थी, उस समय वे अभी जूनियर कॉलेज में ही पढ़ाई कर रहे थे. उन्होंने 3,000 रुपये की शुरुआती पूंजी से यह काम शुरू किया था, जो उन्हें अपने पिता से मिले थे. उनके पिता वन विभाग में 'क्लास IV' कर्मचारी के तौर पर काम करते थे. उस समय उनके इस छोटे से पोल्ट्री फार्म में केवल 100 मुर्गियां थीं.
कॉमर्स में अपनी मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद, उनकी मां को अमरावती के चांदूरबाजार में अपनी मां से (नानी से) विरासत में चार एकड़ जमीन मिली. इसके बाद परिवार ने उस जमीन को बेच दिया और जिले के ही बडनेरा में एक एकड़ जमीन खरीद ली.
PTI से बात करते हुए मेतकर ने बताया कि उन्होंने एक बैंक से 5 लाख रुपये का कर्ज लिया और 4,000 पक्षियों के साथ एक पोल्ट्री फार्म शुरू किया. साल 2006 तक उनका व्यवसाय तेजी से फला-फूला. म्हसाला अंजनगांव बारी गांव में 10 एकड़ जमीन पर फैले उनके इस फार्म में पक्षियों की संख्या बढ़कर 20,000 तक पहुंच गई थी.
हालांकि, उसी साल उन्हें एक बड़ा झटका लगा, जब भारत समेत कई देशों में बड़े पैमाने पर 'बर्ड फ्लू' फैल गया, जिसके चलते उनका पूरा व्यवसाय ठप पड़ गया. लेकिन इन तमाम नुकसानों के बावजूद, उन्होंने एक बार फिर से नई शुरुआत करने का फैसला किया. 2008 में, उन्होंने एक बैंक से 25 लाख रुपये का लोन लेकर नए जोश के साथ इस बिजनेस में कदम रखा. उस समय उनके पोल्ट्री फार्म में 20,000 पक्षी थे.
उन्होंने बताया, "उसके बाद हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि हर साल फार्म में 10,000 नए पक्षी जुड़ते गए." किसान ने कहा, "अभी हम पर कोई बैंक लोन नहीं है, और अब हमारे 50 एकड़ जमीन पर फैले पोल्ट्री फार्म में 1.8 लाख पक्षी हैं, जिसका सालाना टर्नओवर 15 करोड़ रुपये है."
मेतकर ने बताया कि गेहूं और मक्का के अलावा, वे केला, आम, संतरा, मीठा नींबू, चीकू और नारियल जैसी फलों की फसलों की खेती भी करते हैं.
उन्होंने कहा, "नए और प्राकृतिक खेती के तरीकों का इस्तेमाल करके, जिसमें ऑर्गेनिक खाद का उपयोग शामिल है, हम कम लागत में खेती करते हैं और ज्यादा मुनाफा कमाते हैं."
उनके दो भाई और उनका बड़ा बेटा—जिसने एग्रीकल्चर बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और अब MBA कर रहा है—उनके पोल्ट्री बिजनेस और खेती में उनकी मदद करते हैं, जबकि उनके सबसे छोटे बेटे ने विदेश की एक यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की है.
मेतकर ने बताया कि अब उन्होंने अपने पोल्ट्री फार्म में पक्षियों की संख्या बढ़ाना बंद कर दिया है और वे खेती से जुड़े दूसरे कामों में दूसरे किसानों को गाइड करते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि किसान समुदाय के लोग भी आगे बढ़ें.
उन्हें भारत और विदेश के कई एग्रीकल्चर कॉलेजों ने अपनी सफलता की कहानी बताने और एग्रीकल्चर के छात्रों और किसानों को गाइड करने के लिए बुलाया है.
अब तक, उन्होंने सिंगापुर यूनिवर्सिटी, जम्मू में शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, नागपुर में महाराष्ट्र एनिमल एंड फिशरी साइंसेज यूनिवर्सिटी (MAFSU), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी भिलाई, डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ, और इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) जैसी जगहों पर भाषण दिए हैं.
मेतकर ने कहा, "एक समय ऐसा भी था जब मेरे पास पहनने के लिए ठीक-ठाक कपड़े भी नहीं थे. मैं घर पर सिले हुए फटे-पुराने कपड़े पहनता था, और कॉलेज जाने के लिए मेरे पास साइकिल भी नहीं थी." उन्होंने आगे कहा, "मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जाने और अपनी सफलता की कहानी बताने का मौका मिलेगा."
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