आंध्र की प्राकृतिक खेती ने जीता दुनिया का मंचआंध्र प्रदेश में खेती करने के तरीके में एक बहुत बड़ा और अच्छा बदलाव हुआ है. यहां किसानों ने रसायनों वाली खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती को अपनाया है. इसी काम को “आंध्र प्रदेश कम्युनिटी मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग (APCNF)” कहा जाता है. इस प्रयास को अब दुनिया का बहुत बड़ा पुरस्कार मिला है, जिसे 2026 का “फ़ूड प्लैनेट प्राइज़” कहा जाता है. यह पुरस्कार पर्यावरण और खेती में अच्छे बदलाव करने वालों को दिया जाता है.
यह सम्मान स्वीडन में दिया गया और इसकी इनामी राशि भी बहुत बड़ी है. दुनिया भर से हजारों नाम आए थे, लेकिन आंध्र प्रदेश के इस मॉडल को सबसे खास माना गया.
इस पूरी सफलता के पीछे आंध्र प्रदेश के लाखों किसानों की मेहनत है. लगभग 18 लाख किसान परिवार इस प्राकृतिक खेती से जुड़े हुए हैं. इसके साथ ही लाखों महिलाएँ भी इस काम में शामिल हैं, जो अपने गाँवों में किसानों को नई खेती सिखाने में मदद करती हैं.
इन महिलाओं ने अपने घर और गाँव में यह समझाया कि अगर खेत में कम केमिकल और ज्यादा प्राकृतिक चीजें इस्तेमाल हों, तो मिट्टी भी अच्छी रहती है और फसल भी बेहतर होती है.
प्राकृतिक खेती का मतलब है बिना केमिकल खाद और कीटनाशक के खेती करना. इसमें गाय के गोबर, गोमूत्र, पौधों के अवशेष और प्राकृतिक तरीकों से फसल उगाई जाती है. इससे जमीन खराब नहीं होती और फसल भी स्वस्थ रहती है.
इस तरीके से खेती करने पर किसानों की लागत भी कम होती है क्योंकि उन्हें महंगे केमिकल खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती.
आंध्र प्रदेश सरकार ने इस योजना को 2016 में शुरू किया था. सरकार का उद्देश्य था कि किसान धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें. इसके लिए हर गाँव में लोगों को प्रशिक्षण दिया गया और किसानों को समझाया गया कि यह तरीका उनके लिए फायदेमंद है. इस काम में गाँव के कई लोग “कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन” बने. ये लोग दूसरे किसानों को आसान भाषा में बताते हैं कि प्राकृतिक खेती कैसे करनी है.
इस बदलाव में महिलाओं की भूमिका बहुत खास रही है. गाँव की स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की महिलाओं ने किसानों को प्रेरित किया. उन्होंने अपने परिवारों को भी इस खेती के लिए तैयार किया. आज हजारों महिलाएँ इस आंदोलन का हिस्सा हैं और अपने गाँवों में बदलाव की कहानी लिख रही हैं.
इस प्राकृतिक खेती से किसानों को कई फायदे मिले हैं. उनकी फसल की लागत कम हुई है और कमाई बढ़ी है. इसके साथ ही खेत की मिट्टी भी पहले से ज्यादा मजबूत और स्वस्थ हुई है. यह भी देखा गया है कि प्राकृतिक खेती वाली फसलें बारिश, सूखा और कीड़ों जैसी समस्याओं का सामना बेहतर तरीके से कर सकती हैं.
आंध्र प्रदेश का यह मॉडल अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा. इसे श्रीलंका और जाम्बिया जैसे देशों में भी अपनाया जा रहा है. भारत के कई राज्यों में भी किसान इस तरीके को सीख रहे हैं. इससे पता चलता है कि यह मॉडल बहुत सफल है और दुनिया भर में इसकी जरूरत महसूस की जा रही है.
आंध्र प्रदेश सरकार का सपना है कि साल 2047 तक पूरा राज्य प्राकृतिक खेती पर आधारित हो जाए. इसका मतलब है कि हर किसान बिना केमिकल के खेती करे और पूरी खेती प्रकृति के साथ मिलकर हो. सरकार का मानना है कि इससे किसानों की जिंदगी और बेहतर होगी और धरती भी सुरक्षित रहेगी.
इस पुरस्कार से किसानों में खुशी की लहर है. एक किसान ने कहा कि अब वे अपने खेत में उगाया गया साफ और सुरक्षित खाना खुद खा रहे हैं, जिससे उनके परिवार को अच्छा स्वास्थ्य मिल रहा है. दूसरे किसानों का कहना है कि पहले खेती में बहुत मुश्किलें थीं, लेकिन अब प्राकृतिक खेती से उनका काम आसान और बेहतर हो गया है.
आंध्र प्रदेश की यह सफलता दिखाती है कि अगर लोग और सरकार मिलकर काम करें, तो बड़ा बदलाव संभव है. प्राकृतिक खेती ने न केवल किसानों की जिंदगी बदली है, बल्कि पूरी दुनिया को यह संदेश दिया है कि प्रकृति के साथ मिलकर खेती करना ही भविष्य का रास्ता है.
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