Success Story: इंफोसिस वाला इंजीनियर गांव में बेच रहा 12 हजार का एक मुर्गा, कमाई जानकर रह जाएंगे दंग

Success Story: इंफोसिस वाला इंजीनियर गांव में बेच रहा 12 हजार का एक मुर्गा, कमाई जानकर रह जाएंगे दंग

आंध्र प्रदेश के अरबिन्द इंफोसिस में इंजीनियर के पद पर काम करने के साथ-साथअपने गांव में आधुनिक मुर्गी पालन के जरिए सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं. नौकरी की व्यस्तता के बीच भी उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग वाली बुद्धि का इस्तेमाल किया और मुर्गी पालन को एक बड़े बिजनेस में बदल दिया. आज वे एक मुर्गे को 12 हजार की ऊंची कीमत पर बेचकर सालाना लाखों की अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं.ऑफिस की जिम्मेदारी और गांव में किसानी का यह तालमेल वाकई काबिल-ए-तारीफ है

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Success Story: इंफोसिस वाला इंजीनियर गांव में बेच रहा 12 हजार का एक मुर्गा, कमाई जानकर रह जाएंगे दंगनौकरी छोड़े बिना शुरू किया बिजनेस, कमा रहे लाखों का मुनाफा

आंध्र प्रदेश के एलुरु जिले के एक छोटे से गांव वेंकटापुरम में, एक युवा इंजीनियर ने यह साबित कर दिया है कि तकनीक और पारंपरिक खेती का संगम कामयाबी की नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है. यह कहानी है अरविन्द स्वामी की, जो इंफोसिस जैसी बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के साथ-साथ एक सफल पोल्ट्री ब्रीडिंग फार्म के मालिक भी हैं. अरविन्द का यह सफर उन युवाओं के लिए मिसाल है जो अपनी जड़ों से जुड़कर कुछ नया करना चाहते हैं.अरविन्द स्वामी एक मध्यमवर्गीय कृषि परिवार से आते हैं. उन्होंने साल 2012 से 2016 के बीच देश के प्रतिष्ठित संस्थान NIT नागपुर से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की. पढ़ाई के बाद उनका चयन आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनी इंफोसिस में हुआ. लेकिन शहर की चकाचौंध के बीच भी वे अपनी मिट्टी को नहीं भूले. नौकरी के साथ-साथ" इंजीनियरिंग वाली बुद्धि से उन्होंने नौकरी के साथ मुर्गी पालन को मुनाफे वाला बिजनेस बना दिया है.अब सालाना लाखों की एक्स्ट्रा कमाई कर रहा है. मार्केटिंग की समझ और मेहनत ने उन्हें आज 'इंजीनियर किसान' के रूप में मशहूर कर दिया है

नौकरी छोड़े बिना बनें लखपति किसान

अरविन्द के पिता के पास 8 एकड़ का फार्म था जहां पाम ऑयल के पेड़ लगे थे. अरविन्द ने अपनी सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की नौकरी के साथ-साथ इस विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला किया और अपने गांव में ही ब्रीडर पोल्ट्री फार्म की शुरुआत की. अरविन्द का मुख्य उद्देश्य भीमावरम, असील और पेरू जैसी शानदार देसी नस्लों को बचाना और उन्हें आगे बढ़ाना है. उनके फार्म पर इन नस्लों के कई सुंदर प्रकार जैसे काकी, नेमाली, रसांगी और सेतवा आसानी से मिल जाते हैं. अक्सर बाजार में इन खास नस्लों के लिए बहुत ज्यादा पैसे मांगे जाते हैं, लेकिन अरविन्द का लक्ष्य इन्हें आम लोगों के बजट में लाना है. पिछले साल उन्होंने इन्हें 14 से 20 हजार रुपये में बेचा था, पर इस साल पैदावार बढ़ाकर उन्होंने शुरुआती कीमत घटाकर मात्र 12 हजार रुपये कर दी है. उनका मानना है कि वाजिब दाम पर अच्छी नस्ल देना ही उनके बिजनेस की कामयाबी का असली राज है.

सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने किया ये कमाल
सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने किया ये कमाल

गजब की  पोल्ट्री सॉफ्टवेयर इंजीनियर की

पिछले 4 सालो में अरविन्द 400 से ज्यादा पक्षी बेच चुके हैं. अगर औसत 12,000 रुपये के हिसाब से भी देखें, तो वे अब तक लगभग 48 लाख रुपये के पक्षी बेच चुके हैं, यानी हर साल करीब 12 लाख रुपये की कमाई सिर्फ मुर्गों से हो रही है. उनको एक पक्षी पालने में लगभग 5 से 6 हजार रूपये खर्च आता है आज के युवाओं को वे यही सीख देते हैं कि करियर के लिए नौकरी या खेती में से किसी एक को छोड़ने की जरूरत नहीं है. अगर आपके पास सही प्लानिंग और काम करने का जज्बा है, तो आप सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और किसानी, दोनों को एक साथ बखूबी निभा सकते हैं. अक्सर नए किसान भारी निवेश के डर से पोल्ट्री बिजनेस शुरू नहीं कर पाते. अरविन्द उन्हें सलाह देते हैं कि सीधे 1-2 लाख रुपये के बड़े ब्रीडर खरीदने के बजाय 9 महीने के चूजों से शुरुआत करना सबसे सस्ता और सुरक्षित तरीका है.

आंध्र के अरविन्द का 'स्मार्ट पोल्ट्री फार्म मंत्र

वे सुझाव देते हैं कि कोई भी इच्छुक व्यक्ति 6 मादा और 3 नर चूजे लेकर उन्हें बड़ा करे. इसके अलावा, वे जमीन के चुनाव पर भी जोर देते हैं. वे कहते हैं कि फार्म की जमीन धूल भरी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि धूल से मुर्गियों को 'गुरका' (सांस की बीमारी) हो सकती है. धूल को दबाने के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव बहुत जरूरी है. मुर्गियों की मजबूती और गुणवत्ता के लिए अरविन्द ने एक विशेष डाइट चार्ट तैयार किया है. शुरुआत में चूजों को बाजरा और रागी दिया जाता है. 9 महीने तक उन्हें 8 एकड़ के खुले फार्म में स्वतंत्र रूप से छोड़ा जाता है ताकि उनका प्राकृतिक विकास हो सके. जब वे 12 महीने के हो जाते हैं, तो उन्हें ताकत के लिए कीमा, काजू, किशमिश, बादाम और खजूर जैसी पौष्टिक चीजें भी दी जाती हैं. 

कैसे पाल रहे 12 हजार वाला मुर्गा ?

सिर्फ खान-पान ही नहीं, अरविन्द उन्हें शारीरिक रूप से फिट रखने के लिए सुबह व्यायाम और शाम को तैराकी का प्रशिक्षण भी देते हैं, जो उनकी नस्ल की विशिष्टता को बढ़ाता है.पोल्ट्री फार्मिंग में बीमारियों से बचाव सबसे बड़ी चुनौती है. अरविन्द इसके लिए एक सख्त टीकाकरण चक्र का पालन करते हैं. चूजों के जन्म के तीसरे दिन से ही 'मेरेक्स' का टीका लगाया जाता है, जिसके बाद गंबोरा और लासोटा जैसे टीके दिए जाते हैं. वे कहते हैं कि सही समय पर वैक्सीन देने से 90 फीसदी मुर्गियों को बचाया जा सकता है. एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के नाते, उनका भविष्य का लक्ष्य अपने फार्म को पूरी तरह से स्वचालित बनाना है. वे ऐसे सिस्टम पर काम कर रहे हैं जहां दाना खिलाना, पानी देना और तापमान नियंत्रण सब कुछ तकनीक के जरिए ऑटोमैटिक हो सके.

अरविन्द की की कहानी कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में अपार संभावनाएं हैं. अगर अपनी शिक्षा का उपयोग खेती की समस्याओं को सुलझाने में करें, तो हम न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी एक नई दिशा दे सकते हैं.

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