मुर्गियों को बीमारियों से बचाएगा जादुई काढ़ाराजस्थान के डूंगरपुर जिले के एक छोटे से गांव खंतवाड़ा के रहने वाले 52 वर्षीय अब्बासी चिखली ने मुर्गी पालन के क्षेत्र में एक ऐसा क्रांतिकारी नवाचार किया है, जो आज हजारों किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बन गया है. 5 सालों से इस व्यवसाय से जुड़े अब्बासी ने यह महसूस किया कि आदिवासी क्षेत्रों में मुर्गियों को बीमारियों से बचाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि वहां न तो समय पर टीकाकरण की सुविधा उपलब्ध है और न ही महंगी दवाइयां. इसी समस्या का हल ढूंढते हुए उन्होंने अपने अनुभवों और रसोई में उपलब्ध घरेलू औषधियों का उपयोग कर एक विशेष हर्बल काढ़ा तैयार किया. यह काढ़ा न केवल मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, बल्कि रानीखेत, गम्बोरो और ई-कोलाई जैसी घातक बीमारियों को रोकने में भी सक्षम है. उनकी यह नवीन तकनीक पूरी तरह से वैज्ञानिक आधार और प्राकृतिक संतुलन पर आधारित है, जिससे मुर्गियों के स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ अंडों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में भी भारी वृद्धि देखी गई है. यह नवाचार उन गरीब और सीमांत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जिनके पास महंगे इलाज के साधन नहीं हैं.
अब्बासी का यह हर्बल नवाचार पूरी तरह से स्थानीय जड़ी-बूटियों पर आधारित है. इसे बनाने के लिए हल्दी, गुड़, अदरक, लौंग, काली मिर्च, लहसुन और अजवाइन जैसी प्राकृतिक चीजों का उपयोग किया जाता है. 100 पक्षियों की साप्ताहिक खुराक के लिए वे 100 ग्राम लहसुन, 100 ग्राम अदरक, 50 ग्राम अजवाइन, 10 लौंग, 20 ग्राम काली मिर्च, 5 ग्राम हल्दी पाउडर और 50 ग्राम गुड़ का मिश्रण तैयार करते हैं. इन सभी सामग्रियों को 500 मिलीलीटर पानी में डालकर लगभग 30 मिनट तक तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह घटकर 400 मिलीलीटर न रह जाए. ठंडा होने के बाद, इसमें से केवल 80 मिलीलीटर काढ़ा 100 मुर्गियों के पीने के पानी में मिलाकर सप्ताह में एक बार दिया जाता है.
मुर्गी पालन में बीमारियों का समय पर प्रबंधन ही मुनाफे का आधार है. अब्बासी द्वारा तैयार यह काढ़ा मुर्गियों में होने वाली गंभीर बीमारियों जैसे सीआरडी, कोक्सीडियोसिस, फाउल पॉक्स, गाउट एस्परगिलस, और संक्रामक क्रोज़ा से बचाव में प्रभावी साबित हुआ है. लहसुन और अदरक प्राकृतिक एंटी-बायोटिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होते हैं, जो मुर्गियों के श्वसन तंत्र को मजबूत करते हैं. यह काढ़ा न केवल संक्रमण को रोकता है, बल्कि पक्षियों की पाचन शक्ति में भी सुधार करता है, जिससे वे अधिक सक्रिय और स्वस्थ रहते हैं.
इस नवाचार की सबसे बड़ी खूबी इसकी कम लागत है. जहां व्यावसायिक दवाइयां और टीके बहुत महंगे होते हैं, वहीं अब्बासी का यह हर्बल उपचार 100 पक्षियों की साप्ताहिक खुराक के लिए मात्र 45 रुपये में तैयार हो जाता है. राजस्थान के दक्षिणी क्षेत्रों, विशेषकर आदिवासी अंचलों में जहां संसाधनों की कमी है, वहां यह तकनीक किसानों के आर्थिक बोझ को कम करने में मील का पत्थर साबित हुई है. कम खर्च में बेहतर स्वास्थ्य और अधिक अंडा उत्पादन ने स्थानीय किसानों की आय को दोगुना करने में मदद की है.
मुर्गियों को साप्ताहिक रूप से यह काढ़ा देने का एक और बड़ा फायदा उनकी अंडा देने की क्षमता में सुधार के रूप में सामने आया है. स्वस्थ पक्षी न केवल अधिक अंडे देते हैं, बल्कि उन अंडों की पोषक गुणवत्ता और छिलके की मजबूती भी बाजार में उपलब्ध सामान्य अंडों से बेहतर होती है. अब्बासी चिखली की इस सफलता ने यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक ज्ञान को अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो वह आधुनिक विज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है.
इस हर्बल काढ़े में राजस्थान के सभी मुर्गी पालन केंद्रों और विशेषकर पिछवाड़े (Backyard) मुर्गी पालन के लिए व्यापक रूप से फैलने की जबरदस्त क्षमता है. इसके परिणाम बहुत उत्साहजनक हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर इसके व्यावसायिक उपयोग से पहले इसका सटीक वैज्ञानिक प्रमाणीकरण जरूरी है. अगर इसे प्रयोगशाला स्तर पर प्रमाणित कर दिया जाए, तो यह उन दुर्गम क्षेत्रों के लिए रामबाण साबित होगा जहां नियमित टीकाकरण की पहुंच बहुत कम या बिल्कुल नहीं है.
अब्बासी चिखली का यह सफर डूंगरपुर के खंतवाड़ा गांव से शुरू होकर आज पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है. उनका यह प्रयास न केवल पशुपालन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का संदेश देता है, बल्कि मुर्गियों को रसायनों और एंटी-बायोटिक्स से बचाकर जैविक मुर्गी पालन की ओर भी ले जाता है. आने वाले समय में, अगर इस तकनीक को सरकारी सहायता और वैज्ञानिक मान्यता मिलती है, तो यह राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश के मुर्गी पालकों के लिए एक सफल मॉडल बन सकता है.
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