गेहूं के पीले रतुआ रोग से सावधान रहें किसानमौसम में बदलाव के दौरान तापमान में उतार-चढ़ाव और नमी बढ़ने के साथ, खेती के जानकारों ने किसानों को अलर्ट रहने और अपनी गेहूं और सरसों की फसलों को बीमारियों के हमले से बचाने के लिए समय पर कदम उठाने की सलाह दी है. खेती विभाग के जानकारों के अनुसार, बदलते मौसम की वजह से खड़ी फसलों में फंगल और वायरल बीमारियों के लिए अच्छा माहौल बन जाता है.
गेहूं में, किसानों को पीला रतुआ (येलो रस्ट), लीफ ब्लाइट और पाउडरी मिल्ड्यू के लक्षणों के लिए खेतों पर रेगुलर नजर रखने की सलाह दी गई है. जल्दी पता लगाने और बताए गए फंगसनाशकों का समय पर स्प्रे करने से इन्फेक्शन को फैलने से रोकने और पैदावार को बचाने में मदद मिल सकती है.
इसी तरह, सरसों उगाने वालों को व्हाइट रस्ट और डाउनी मिल्ड्यू जैसी बीमारियों पर कड़ी नजर रखने के लिए कहा गया है, जो समय पर कंट्रोल न करने पर पत्तियों और फलियों को नुकसान पहुंचा सकती हैं. जानकार खेती की गाइडलाइन के अनुसार खेत की सही सफाई, खाद का संतुलित इस्तेमाल और जरूरत के हिसाब से कीटनाशकों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं.
किसानों को बादल वाले मौसम में ज्यादा सिंचाई से बचने के लिए भी कहा गया है, क्योंकि ज्यादा नमी से बीमारी तेजी से बढ़ सकती है. उन्हें सलाह दी गई है कि कोई भी केमिकल इस्तेमाल करने से पहले लोकल खेती के अधिकारियों से सलाह लें ताकि सही डोज और इस्तेमाल का तरीका पक्का हो सके.
वैज्ञानिकों ने बताया कि पीला रतुआ के लिए 10-20 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त है. 25 डिग्री सेल्सियस तापमान से अधिक होने पर रोग का फैलाव नहीं होता. भूरा रतुआ के लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ नमी युक्त जलवायु जिम्मेदार है. जबकि काला रतुआ के लिए 20 डिग्री सेल्सियस से उपर तापमान ओर नमी रहित जलवायु जिम्मेदार है. इतना तापमान हो तो गेहूं की फसल को लेकर सतर्क रहें.
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