आम के बौर के लिए बेहद खतरनाक है झुलसा रोगखेती के बाद बागवानी किसानों के लिए बेहतर आय का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरी है. फल उत्पादन के कुल क्षेत्रफल में से लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले आम की बागवानी के अंतर्गत आता है. उत्तर प्रदेश से लेकर कन्याकुमारी तक, आपको हर राज्य में आम के छोटे-बड़े बाग देखने को मिल जाएंगे. आम की विभिन्न किस्में जैसे दशहरी, लंगड़ा, चौसा और अल्फांसो न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय हैं.
वर्तमान समय में आम के पेड़ों पर 'मंजर' या 'बौर' आने का सीजन चल रहा है. यह समय किसानों के लिए बेहद संवेदनशील होता है क्योंकि इसी दौरान की गई देखभाल तय करती है कि साल भर की मेहनत का फल कैसा होगा. अगर इस समय सही प्रबंधन न किया जाए, तो पेड़ कई तरह के कीटों और बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है. सीआइएसएच ,रहमानखेड़ा, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने आम के बागवानों को बौर आने के समय घातक कीट और रोगों से बचाव के उपाय बताए हैं.
आम के बागों में कभी-कभी समय से पहले यानी 'अगेती बौर' निकल आता है. इस नाजुक बौर पर 'झुलसा रोग' का खतरा सबसे अधिक होता है. यह रोग मुख्य रूप से फफूंदी के कारण फैलता है और इसके संक्रमण से फूल और छोटे-अविकसित फल समय से पहले ही झड़कर गिरने लगते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, जब वातावरण में नमी या आर्द्रता 80 प्रतिशत से अधिक हो जाती है या बेमौसम बारिश होती है, तो यह रोग अत्यंत आक्रामक हो जाता है. इससे किसानों को गंभीर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
इसके बचाव के लिए किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मैन्कोजेब और कार्बेन्डाजिम के 0.2 घोल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें. इसके अलावा, ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोबिन और टेबूकोनाजोल के मिश्रण का 0.025 फीसदी घोल भी इस रोग को रोकने में अत्यंत कारगर साबित होता है.
जनवरी का पहला सप्ताह आते ही आम के बागों में 'गुजिया कीट'की हलचल शुरू हो जाती है. यह कीट जमीन से रेंगकर पेड़ के तनों के जरिए बौर तक पहुँचता है और रस चूसकर उन्हें सुखा देता है. इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए 'संशोधित ट्री-बैंडिंग' सबसे अच्छी तकनीक है. इसके लिए 1 किलो चिकनी मिट्टी में 250 ग्राम पी.ओ.पी. और 50 मिलीलीटर जला हुआ मोबिल तेल मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट तैयार करें. इस पेस्ट की 2-3 इंच चौड़ी पट्टी पेड़ के तने पर चारों तरफ लगाएं. इसके ऊपर पॉलीथीन की शीट या सेलो टेप को इस तरह लपेटें कि मिट्टी की पट्टी बीच में रहे. इसे सुतली से कसकर बांध दें ताकि कीट ऊपर न चढ़ सकें. अगर कीट पहले ही बौर तक पहुँच चुके हैं, तो डायमेथोएट 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए ह
आम के पुष्प गुच्छों को नुकसान पहुंचाने वाला 'मिज कीट' एक बेहद खतनाक कीट है. हालांकि इसका प्रकोप जनवरी से जुलाई तक बना रहता है, लेकिन सबसे अधिक क्षति यह बौर और नन्हे फलों को पहुंचाता है. इस कीट के आक्रमण की पहचान बौर के डंठल, पत्तियों की नसों या कोमल तनों पर काले या कत्थई धब्बों से की जा सकती है. इन धब्बों के बीच में एक सूक्ष्म छेद होता है, जिससे प्रभावित हिस्सा टेढ़ा-मेढ़ा होकर सूखने लगता है. इस कीट की रोकथाम के लिए किसानों को चाहिए कि वे लक्षणों के दिखते ही डायमेथोएट 30% 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.
आम की बागवानी में दवाओं के छिड़काव का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है. जब पेड़ों पर बौर पूरी तरह खिल जाएं या लगभग 50 प्रतिशत तक फूल आ चुके हों, तो उस समय किसी भी कीटनाशक या दवा का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए. इसका कारण यह है कि इस दौरान मधुमक्खियां और अन्य मित्र कीट परागण के लिए फूलों पर आते हैं. अगर इस समय छिड़काव किया गया, तो ये मित्र कीट मर जाएंगे और फायदे की जगह भारी नुकसान हो सकता है. दवाओं के प्रयोग का सही समय तब होता है जब फूल झड़ जाएं और छोटे फल सरसों के दाने के बराबर दिखाई देने लगें. इसी अवस्था में कीटों और रोगों से बचाव का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए ताकि पैदावार अच्छी हो.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today