अल-नीनो के असर में भी धान की अच्छी पैदावार का फॉर्मूला, लाइन में बुवाई और नैनो डीएपी बनेगी किसानों की ताकत

अल-नीनो के असर में भी धान की अच्छी पैदावार का फॉर्मूला, लाइन में बुवाई और नैनो डीएपी बनेगी किसानों की ताकत

अल-नीनो के संभावित प्रभाव और कम बारिश की आशंका के बीच धान किसानों के लिए उत्पादन बनाए रखना चुनौती बन सकता है. ऐसे में कृषि विभाग ने कतार बोनी, नमी संरक्षण और नैनो डीएपी जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की सलाह दी है, जिससे कम वर्षा में भी धान की बेहतर पैदावार सुनिश्चित की जा सके.

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अल-नीनो के असर में भी धान की अच्छी पैदावार का फॉर्मूला, लाइन में बुवाई और नैनो डीएपी बनेगी किसानों की ताकत

खरीफ सीजन 2026 में मानसून की अनिश्चितता और कम वर्षा की आशंका के बीच किसानों के सामने धान उत्पादन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के अनुसार इस वर्ष देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान औसत से कम वर्षा होने की संभावना जताई गई है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अल-नीनो के प्रभाव के कारण मानसून कमजोर रह सकता है, जिसका असर धान जैसी पानी पर निर्भर फसलों पर देखने को मिल सकता है.

ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ कृषि विभाग ने किसानों को पारंपरिक खेती के बजाय वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की सलाह दी है. विभाग का कहना है कि यदि किसान कतार बोनी, नमी संरक्षण और नैनो डीएपी जैसी आधुनिक तकनीकों का समन्वित उपयोग करें तो कम बारिश की स्थिति में भी धान की फसल को सुरक्षित रखते हुए अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

कतार बोनी क्यों बन रही किसानों की पहली पसंद

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान की सीड ड्रिल से कतार बोनी वर्तमान मौसम परिस्थितियों में सबसे प्रभावी तकनीकों में से एक है. इस पद्धति में बीज निश्चित दूरी और गहराई पर बोए जाते हैं, जिससे पौधों का विकास संतुलित रूप से होता है.

कतार बोनी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पौधों की जड़ें मिट्टी में गहराई तक फैलती हैं और उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग कर पाती हैं.जब दो बारिशों के बीच लंबा अंतराल होता है, तब यही गहरी जड़ें पौधों को सूखे जैसी परिस्थितियों से बचाने में मदद करती हैं.

पारंपरिक छिटकवां बुवाई में पौधे अनियमित रूप से उगते हैं, जिससे उनमें पोषक तत्वों, पानी और सूर्य प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है.जबकि कतार बोनी में पौधों को पर्याप्त स्थान मिलता है, जिससे उनकी वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है.

नमी संरक्षण में भी कारगर है यह तकनीक

कतारों में बोई गई फसल में निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण का कार्य आसान हो जाता है.समय पर खरपतवार नियंत्रण होने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है. साथ ही खेत में डाले गए उर्वरकों का उपयोग भी फसल बेहतर तरीके से कर पाती है, जिससे लागत में कमी आती है और लाभ बढ़ता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि कम वर्षा वाले वर्षों में नमी संरक्षण ही फसल बचाने की सबसे महत्वपूर्ण रणनीति होती है. इसलिए खेतों में मजबूत मेड़बंदी और जल संरक्षण के उपायों को भी अपनाना आवश्यक है.

नैनो डीएपी से मिलेगी फसल को शुरुआती ताकत

कृषि विभाग इस खरीफ सीजन में किसानों को नैनो डीएपी के उपयोग के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है.नैनो डीएपी में फॉस्फोरस के अत्यंत सूक्ष्म कण होते हैं, जो पौधों द्वारा तेजी से अवशोषित किए जाते हैं.

फॉस्फोरस जड़ों के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व है. नैनो डीएपी के उपयोग से पौधों की जड़ें तेजी से विकसित होती हैं, जिससे वे मिट्टी में उपलब्ध नमी और पोषक तत्वों का अधिक प्रभावी उपयोग कर पाती हैं.कम नमी की स्थिति में भी फसल की प्रारंभिक बढ़वार बेहतर रहती है और पौधे प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम बनते हैं.

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि नैनो डीएपी पौधों की पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने में मदद करता है, जिससे सूखे के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

जैव उर्वरकों और नैनो यूरिया का भी करें उपयोग

विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे केवल एक तकनीक पर निर्भर न रहें, बल्कि नैनो डीएपी, नैनो यूरिया और जैव उर्वरकों का समन्वित उपयोग करें. इससे फसल को संतुलित पोषण मिलता है और पौधों की वृद्धि बेहतर होती है.

जैव उर्वरक मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम करते हैं. वहीं नैनो यूरिया नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों को अधिक समय तक हरा-भरा बनाए रखने में मदद करता है.किसानों के लिए कृषि विभाग की प्रमुख सलाह धान की बुवाई सीड ड्रिल के माध्यम से कतारों में करें.

 

 

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