आम की फसल में ‘पुष्पीय मालफॉर्मेशन’ या गुच्छा रोगआम को फलों का राजा कहा जाता है, लेकिन 'पुष्पीय मालफॉर्मेशन' या 'गुच्छा रोग' इसकी खेती के लिए एक अभिशाप बन चुका है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के पादप सुरक्षा विभाग के हेड विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ.एस. के. सिंह के अनुसार, यह रोग न केवल फूलों की बनावट बिगाड़ देता है, बल्कि 50 से 60 प्रतिशत तक पैदावार को नष्ट कर सकता है. जब आम के पेड़ पर बौर आने का समय होता है, तब संक्रमित पुष्पक्रम असामान्य रूप से घने, छोटे और झाड़ीनुमा हो जाते हैं. इन फूलों में फल बनने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है.
हालिया वैज्ञानिक शोधों ने स्पष्ट किया है कि यह बीमारी केवल एक साधारण कवक नहीं, बल्कि 'फ्यूजेरियम' समूह के जटिल कवक और पौधे के भीतर हार्मोनल असंतुलन, विशेषकर एथिलीन की अधिकता के कारण होती है. यह रोग हवा और संक्रमित टहनियों के माध्यम से तेजी से फैलता है, इसलिए इसे हल्के में लेना बागवानी के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
मालफॉर्मेशन की पहचान फूल आने के शुरुआती चरण में ही की जा सकती है. प्रभावित पुष्पक्रम या पैनिकल सामान्य की तुलना में अधिक मोटे, हरे और गुच्छेदार दिखाई देते हैं. इसमें फूलों की संख्या तो बहुत अधिक होती है, लेकिन वे सभी 'बांझ' होते हैं, यानी उनमें फल नहीं लगते. संक्रमित हिस्सा लंबे समय तक पेड़ पर लटका रहता है और सूखने के बाद भी आसानी से नहीं गिरता.
इस बीमारी को जड़ से खत्म करने का सबसे प्राथमिक तरीका 'सफाई' है. किसानों को चाहिए कि वे संक्रमित पुष्पक्रम और टहनियों को प्रभावित स्थान से लगभग 15-20 सेमी नीचे से काटकर हटा दें. इन कटी हुई टहनियों को बाग में छोड़ने के बजाय दूर ले जाकर जला देना चाहिए. बाग की नियमित छंटाई और उचित सिंचाई प्रबंधन कवक के प्रसार को रोकने में बहुत प्रभावी साबित होते हैं.
वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, पौधों में हार्मोन का संतुलन बिगाड़ना इस रोग का बड़ा कारण है. इसे नियंत्रित करने के लिए 'नैफ्थलीन एसिटिक एसिड' (NAA) का उपयोग जादुई असर दिखाता है. अक्टूबर के महीने में 100-200 ppm सांद्रता वाले NAA का छिड़काव करने से अगले सीजन में फूलों का विकास सामान्य होता है और मालफॉर्मेशन की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है.
फफूंदनाशकों का सही समय पर चुनाव फसल बचा सकता है. इसके लिए कार्बेन्डाजिम (0.1%) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (0.3%) का छिड़काव अनुशंसित है. साथ ही, अब जैविक खेती की दिशा में Trichoderma harzianum जैसे मित्र कवक का उपयोग भी बढ़ रहा है, जो हानिकारक फ्यूजेरियम को बढ़ने से रोकते हैं. नैनो-टेक्नोलॉजी आधारित नए शोध भी भविष्य में इसके सटीक उपचार के लिए आशा की किरण जगा रहे हैं.
केवल दवाओं से ही नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारकर भी इस बीमारी से लड़ा जा सकता है. जिंक, बोरॉन और कॉपर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. यदि किसान एकीकृत रोग प्रबंधन तहत इन सभी वैज्ञानिक विधियों को एक साथ अपनाते हैं, तो वे आम की फसल को इस रहस्यमयी बीमारी से बचाकर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं.
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