हाथियों के आतंक से मिलेगी राहतझारखंड के एक 18 साल के युवा ने ऐसा कम लागत वाला AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आधारित डिवाइस तैयार किया है, जो खेतों में घुसने वाले हाथियों का समय रहते पता लगाकर उन्हें दूर भगाने में मदद करेगा. इससे न सिर्फ किसानों की फसलों को नुकसान से बचाया जा सकेगा, बल्कि इंसानों और हाथियों के आतंक से बचाने में भी मदद करेगा. खास बात यह है कि ये AI डिवाइस सोलर पावर से चलता है और फिलहाल पलामू टाइगर रिजर्व में इसका सफल परीक्षण किया जा रहा है. अगर यह पूरी तरह सफल रहा, तो जल्द ही झारखंड के कई इलाकों में इसे लगाया जाएगा, जिससे हजारों किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है.
रांची के रहने वाले 18 वर्षीय अवि मोहन कुमार शुक्ला, जिन्होंने हाल ही में 12वीं की परीक्षा पास की है, पिछले तीन महीनों से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. उन्होंने अपने इस डिवाइस का नाम 'इनोबॉक्स' (Innobox) रखा है. यह सोलर एनर्जी से चलने वाला AI आधारित वाइल्डलाइफ डिटरेंट डिवाइस है, जिसे खास तौर पर हाथियों और दूसरे जंगली जानवरों को खेतों से दूर रखने के लिए बनाया गया है.
अवि के मुताबिक, इस डिवाइस में सीस्मिक सेंसर, रडार और AI कैमरे लगाए गए हैं. ये सेंसर जमीन में होने वाली हलचल और आसपास मौजूद बड़े जानवरों की पहचान करते हैं. जब सिस्टम को हाथी जैसे बड़े जानवर का पता चलता है, तभी यह सायरन बजाता है. इससे बेवजह अलार्म नहीं बजता और ग्रामीणों को भी परेशानी नहीं होती. यह डिवाइस सोलर पावर से चलता है, इसलिए बैटरी जल्दी खत्म होने की समस्या भी नहीं रहती.
झारखंड के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक रवि रंजन ने बताया कि वन विभाग ने अवि के प्रोजेक्ट को समर्थन देते हुए ऐसे 10 AI आधारित डिवाइस तैयार करने के लिए एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी है. इन डिवाइसों का परीक्षण फिलहाल पलामू टाइगर रिजर्व में किया जा रहा है, जहां अब तक करीब 80 से 85 प्रतिशत तक सटीक परिणाम मिले हैं. वहीं, वन विभाग के अनुसार, परीक्षण सफल रहने के बाद अगस्त महीने में रांची जिले के कुछ इलाकों में इस डिवाइस को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लगाया जाएगा. यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में इसे पूरे झारखंड में लगाया जाएगा. अधिकारियों का मानना है कि कम लागत होने के कारण यह तकनीक बड़े स्तर पर आसानी से अपनाई जा सकती है.
झारखंड में इंसान और हाथियों के बीच टकराव लंबे समय से गंभीर समस्या बनी हुई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2019-20 से अब तक राज्य में हाथियों के हमलों में 474 किसानों और आम लोगों की जान जा चुकी है. इसके अलावा हर साल हजारों एकड़ फसल भी बर्बाद होती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
अवि ने बताया कि जब वे 11वीं कक्षा में थे, तब उन्हें IIM रांची के 'यंग चेंज मेकर' कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला. इसी दौरान वे रांची के रसाबेदा गांव पहुंचे, जहां उन्होंने देखा कि हाथियों ने किसानों की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है. किसानों की परेशानी देखकर उनके मन में ऐसा डिवाइस बनाने का विचार आया, जो हाथियों की समय रहते पहचान कर ग्रामीणों को अलर्ट कर सके और जानवरों को खेतों से दूर रख सके. उन्होंने सबसे पहले इसका शुरुआती मॉडल गांव में लगाया, जिससे करीब 35 परिवारों को फायदा हुआ. इसके बाद उन्होंने इसे तैयार करना शुरु किया.
अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो इससे किसानों की फसल को जंगली जानवरों और हाथियों से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है. साथ ही ग्रामीणों की सुरक्षा भी बेहतर होगी और इंसान और वन्यजीवों के बीच होने वाले टकराव को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी. यह पहल इस बात का उदाहरण है कि युवा प्रतिभाएं और स्वदेशी तकनीक मिलकर खेती और वन संरक्षण जैसी बड़ी समस्याओं का समाधान निकाल सकती हैं. (PTI)
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