Innovative farmer: आम के बाग में 'केले' का जाल, किसान के देसी जुगाड़ से घातक कीटों का होगा सफाया

Innovative farmer: आम के बाग में 'केले' का जाल, किसान के देसी जुगाड़ से घातक कीटों का होगा सफाया

पटना के अनुभवी किसान अमरजीत कुमार सिन्हा ने आम और अमरूद जैसे रसीले फलों को 'फल मक्खी' के जानलेवा हमले से बचाने के लिए एक बेहद सस्ता और 'असरदार' देसी जुगाड़ निकाला है. अक्सर ये मक्खियां फलों को अंदर से सड़ा देती हैं, जिससे बागवानों को 90 फीसदी तक का भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इस समस्या के 'मुकम्मल' समाधान के लिए उन्होंने पके हुए केलों और बेकार प्लास्टिक की बोतलों से एक 'कीट जाल' तैयार किया है जिससे फल मक्खी खिंची चली आती हैं और जाल में फंसकर मर जाती हैं.

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Innovative farmer: आम के बाग में 'केले' का जाल, किसान के देसी जुगाड़ से घातक कीटों का होगा सफायापटना के किसान का देसी जुगाड़

आम के बागानों में जब फल पकने की बारी आती है, तो बागवानों की सबसे बड़ी दुश्मन 'फल मक्खी' यानी फ्रूट फ्लाई बनकर सामने आती है. यह छोटी सी मक्खी देखते ही देखते पूरी फसल को मटियामेट कर देती है. अगर फल मक्खी का प्रकोप हो गया तो 90% तक नुकसान पहुंचा सकती है. जब मक्खी फल के छिलके को छेदकर अंदर अंडे देती है, तो निकलने वाले लार्वा फल को अंदर से सड़ा देते हैं. ऐसे में किसान अक्सर महंगे और जहरीले कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जो न केवल इंसानी सेहत के लिए खतरनाक हैं, बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं.

पटना के लोदीपुर चांदमारी के रहने वाले 61 वर्षीय अनुभवी किसान अमरजीत कुमार सिन्हा ने इस समस्या का एक ऐसा 'नायाब' और सस्ता समाधान ढूंढा है, जिसने कृषि वैज्ञानिकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है. उन्होंने अपने 30 सालों के तजुर्बे से एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो खतरनाक कीट फल मक्खी से बचाकर खतरनाक केमिकल के बोझ को कम कर आम की मिठास को महफूज रखती है.

बेकार बोतलों और पके केलों से फंसाने वाला जाल

अमरजीत जी की इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है. इसके लिए किसी खास 'हुनर' या महंगी मशीनरी की जरूरत नहीं पड़ती, इस तरीके में बेकार पड़ी प्लास्टिक की बोतलों को बीच से काटकर एक 'बैट स्टेशन' बनाया जाता है. इसमें ज्यादा पके हुए केलों का इस्तेमाल चारे के तौर पर किया जाता है, जिसमें नुवाक्रोन जैसी दवा की महज चंद बूंदें मिलाई जाती हैं. पके हुए केलों की खुशबू फल मक्खियों को अपनी ओर 'पुरजोर' तरीके से खींचती है. जैसे ही मक्खियां इस जाल में बैठती हैं, वे चंद घंटों में ही खत्म हो जाती हैं. यह तकनीक इतनी 'असरदार' है कि इसे पेड़ पर लटकाते ही अपना काम शुरू कर देती है और एक बार तैयार किया गया चारा करीब 6 से 7 दिनों तक मक्खियों का सफाया करता रहता है.

बहुत कम खर्च में फल मक्खी से हिफाजत

खेती-किसानी में मुनाफा तभी बढ़ता है जब लागत कम हो. अमरजीत जी का यह 'बनाना ट्रैप' इस पैमाने पर बिल्कुल खरा उतरता है. जहाx बाजार में मिलने वाले रेडीमेड ट्रैप की कीमत प्रति हेक्टेयर लगभग 2000 रुपये तक आती है, वहीं इस देसी तकनीक से प्रति हेक्टेयर का खर्च मात्र 100 से 150  रुपये बैठता है. एक एकड़ के बाग के लिए महज 25-30 ट्रैप काफी होते हैं, और एक ट्रैप की लागत मात्र 3 से 4 रुपये आती है और एक ट्रैप 4 से 5 पौधे के लिए काम करता है.

इस छोटे से निवेश का 'नतीजा' यह है कि बागों में फल मक्खी का प्रकोप 90 फीसदी तक कम हो जाता है. इससे न केवल फल सुरक्षित रहते हैं, बल्कि उनकी चमक और गुणवत्ता भी बरकरार रहती है, जिससे किसानों को मंडी में बेहतर दाम मिलते हैं.

सेहत की हिफाजत और पर्यावरण से 'दोस्ताना'

अमरजीत जी के इस नवाचार का सबसे 'अहम' पहलू स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा है. आम तौर पर किसान पूरे पेड़ पर कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जिससे दवा का असर सीधे फलों पर पड़ता है और उपभोक्ता के शरीर में पहुंचता है. लेकिन इस 'ट्रैप' विधि में जहर का इस्तेमाल बहुत ही सीमित मात्रा में और सिर्फ बोतल के अंदर होता है. यह एक 'इको-फ्रेंडली' तरीका है जो लाभकारी कीटों को नुकसान पहुंचाए बिना सिर्फ दुश्मन मक्खियों को निशाना बनाता है. यह तकनीक 'इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट' यानी आईपीएम का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो भविष्य की 'सस्टेनेबल' खेती के लिए बेहद जरूरी है.

सब्जी और फल की जहरमुक्त खेती का खास नुस्खा

अमरजीत कुमार सिन्हा की इस कामयाबी ने सब्जी और बागवानों के बीच एक नई उम्मीद जगाई है. आम और अमरूद में इसकी सफलता को देखते हुए अब इसे जामुन जैसे नाजुक फलों और खीरा, कद्दू, लौकी जैसी बेल वाली सब्जियों पर भी आज़माने की जरूरत है. अगर इस तकनीक को सरकारी स्तर पर 'तवज्जो' मिले और व्यापक पैमाने  किया जाए, तो यह न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधार सकता है, बल्कि देश में 'कीटनाशक मुक्त' फलों के उत्पादन में एक अहम बदलाव ला सकता है. अमरजीत की ये खोज इस बात की गवाही देती है कि अनुभव का साथ मिले, तो कम संसाधनों में भी बड़े 'कारनामे' किए जा सकते हैं.

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