
ईरान युद्ध का असर नहीं, बायोगैस प्लांट से पूरी होती जरूरतइजराइल-ईरान युद्ध के बाद देशभर में एलपीजी गैस की किल्लत है, मगर राजस्थान में भीलवाड़ा जिले के आसींद में एक ऐसा भी गांव है जो इस कमी से बेअसर है. इस गांव में 120 परिवार रहते हैं, मगर पिछले कई वर्षों से यहां एक भी गैस सिलेंडर नहीं मंगवाया गया है. जी हां, यह गांव है भीलवाड़ा जिले में आसींद तहसील में स्थित मोतीपुर, जहां करीब 120 परिवार रहते हैं. ग्रामीणों ने 4 साल पहले इस गांव में बायोगैस प्लांट की शुरुआत की थी.
इसमें इस गांव के 120 परिवारों ने अपने घर में सब्सिडी के माध्यम से यह प्लांट लगवाया. इसमें कुल 40 हजार रुपये का खर्च आया, जिसमें 30 हजार रुपये सब्सिडी और 10 हजार रुपये ग्रामीणों से लिए गए. इसके बाद डेयरी सहकारी समिति ने यहां दो हेक्टेयर जमीन को 99 साल की लीज पर लेकर जैविक खाद प्लांट भी लगाया. इसमें आधुनिक मशीनों से जैविक खाद तैयार कर उसकी पैकिंग की जाती है. यह खाद अच्छे दामों में बाजार में बेच दी जाती है, जिससे पशुपालकों को दोहरा लाभ भी हो रहा है.
सरपंच प्रतिनिधि ओमप्रकाश जाट ने कहा कि हमारे गांव में करीब 4 साल पहले बायोगैस की शुरुआत की गई. भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ के प्रबंध संचालक द्वारा गांव में 4-5 बैठकें की गईं. जगह-जगह लोगों को बताया गया और जागरुक किया गया. इसके बाद तय हुआ कि काश्तकार को 10 हजार रुपये लगाने होंगे और 30 हजार रुपये एनडीबीटी के माध्यम से, काश्तकारों को सब्सिडी दिलाई गई. जाट ने कहा, यहां हमारे गांव के बडला, मोतीपुर और जबरिया मोतीपुर में करीब 120 प्लांट लगे. इन प्लांटों में करीब 8-10 किलो गोबर लगता है, जिससे तकरीबन 4 किलो गैस बन जाती है. इससे खाना पकाना, पानी गर्म करना, दूध बनाना और चाय बनाना हो जाता है.

ओमप्रकाश जाट ने कहा, आम आदमी जो पहले गैस टंकी लगवाता था, अब उसकी जरूरत खत्म हो गई है. इसके बाद भी अतिरिक्त गैस का स्टॉक रह जाता है. इसमें एक दिन छोड़कर एक दिन गोबर डाला जाता है. इसमें से जो वेस्टेज निकलता है, उस पर भी भीलवाड़ा डेयरी द्वारा खाद का प्लांट लगा रखा है. उसमें इसे आर्गेनिक खाद के रूप में तैयार किया जाता है जिसमें 25 किलो का कट्टा 375 रुपये में भीलवाड़ा डेयरी द्वारा संचालित प्लांट से काश्तकारों को मिल जाता है. इससे हमें गैस भी मिल जाती है और खाद से अलग आय भी हो जाती है.
आर्गेनिक खाद प्लांट कर्मचारी हेमराज गोस्वामी ने कहा कि गांव से जो गोबर लाया जाता है, वह टैंकर में भरकर यहां लाया जाता है. फिर यहां आकर इन टैंकों में खाली किया जाता है. टैंकों के माध्यम से इसमें पानी और गोबर दोनों अलग हो जाते हैं. फिर गोबर को अलग सुखाया जाता है. सुखाने के बाद उसे पीसा जाता है और फिर 50 किलो गोबर और 50 किलो रॉक फॉस्फेट मिलाकर उसके दाने बनाए जाते हैं. फिर इन दानों को बाहर दोबारा सुखाया जाता है. इसके बाद इस खाद को डेयरी को भेज दिया जाता है.
ग्रामीण रतन सिंह राठौड़ ने कहा कि 40 हजार का यह प्लांट है. हमने करीब 4 साल पहले इसे यहां लगाया था, जिसमें हमने केवल 10 हजार रुपये लगाए. बाकी सब भारत सरकार ने सब्सिडी दी. कम से कम 4 साल में हमने एक भी गैस टंकी नहीं खरीदी. हमारे घर में 8 सदस्य हैं और आठों का खाना इसी से बन जाता है. कभी कोई समस्या नहीं हुई. हमेशा, जब भी जरूरत हो, 24 घंटे गैस उपलब्ध रहती है. हमारे पास 8-10 गाय-भैंस हैं और अपना खुद का गोबर है. अगर इस खाद को खेत में डालते हैं, तो फसल की उपज भी दोगुनी हो जाती है. इसका रिजल्ट भी बहुत अच्छा आता है.
डेयरी द्वारा 75 पैसे किलो के हिसाब से यह लिक्विड ले जाया जाता है और उसका पैसा हमारे खाते में आ जाता है. इस गैस प्लांट में किसी तरह के विस्फोट का भी खतरा नहीं है. छोटा बच्चा भी इसे चालू कर सकता है. अगर चालू भी रह जाए तो भी विस्फोट होने का कोई खतरा नहीं है. गैस खत्म होने की भी कोई समस्या नहीं होती. यह बहुत शानदार चलता है और इसमें कोई बदबू भी नहीं आती.

ग्रामीण महिला भंवर कंवर राठौड़ ने कहा कि 4 साल पहले हमने यह बायोगैस लगवाई थी. इससे 8 लोगों का खाना बन जाता है. इसमें विस्फोट होने की कोई समस्या नहीं है और यह बहुत अच्छा चल रहा है, जिसमें कोई दिक्कत नहीं है.
मोतीपुर गांव आज आत्मनिर्भरता की एक मिसाल बन गया है. यहां बायोगैस प्लांट ने न सिर्फ ग्रामीणों को गैस की समस्या से पूरी तरह मुक्त कर दिया है, बल्कि जैविक खाद के जरिए अतिरिक्त आय का रास्ता भी खोल दिया है. गोबर से बनने वाली गैस से खाना पक रहा है, खेतों में जैविक खाद से फसल की पैदावार बढ़ रही है और डेयरी को मिलने वाले अवशेष से ग्रामीणों की आमदनी भी हो रही है. विकसित भारत का यह मॉडल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, जिसे अन्य गांव भी अपनाकर गैस संकट से राहत पा सकते हैं.
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