गन्ने का एफआरपी और अधिक बढ़ाने की मांगकेंद्र सरकार ने सोमवार को गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) में बढ़ोतरी का ऐलान किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक के बाद यह फैसला लिया गया, जिसमें गन्ने का FRP पिछले साल के मुकाबले 10 रुपये बढ़ाकर 365 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया. हालांकि सरकार इसे किसानों के लिए राहत बता रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है. कई किसान संगठनों ने इस बढ़ोतरी को नाकाफी बताते हुए FRP और बढ़ाने की मांग की है.
महाराष्ट्र में स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी ने कहा कि मौजूदा हालात में 365 रुपये प्रति क्विंटल का FRP किसानों के खर्च को भी पूरा नहीं कर पा रहा है. उनका कहना है कि खाद, बीज, डीजल और मजदूरी की बढ़ती कीमतों को देखते हुए गन्ने का FRP कम से कम 385 रुपये प्रति क्विंटल किया जाना चाहिए.
केंद्र सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि 2026-27 के लिए गन्ने की उत्पादन लागत 182 रुपये प्रति क्विंटल है. किसान नेताओं का कहना है कि यह आंकड़ा वास्तविक लागत से काफी कम है. उनका तर्क है कि बीते कुछ वर्षों में खेती का खर्च तेजी से बढ़ा है, खासकर खादों की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है.
स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के सोलापुर जिला अध्यक्ष विजय रणदिवे ने कहा कि पिछले पांच साल में गन्ने का FRP सिर्फ करीब 20 फीसदी बढ़ा है, जबकि खेती का खर्च दोगुने से भी ज्यादा हो गया है. उन्होंने बताया कि पहले जहां खाद की एक बोरी करीब 900 रुपये में मिल जाती थी, अब उसकी कीमत 2400 रुपये तक पहुंच गई है.
ट्रैक्टर से गन्ने की कटाई और परिवहन का खर्च भी 600 रुपये से बढ़कर 1400 रुपये प्रति हेक्टेयर हो गया है. मजदूरी, बीज और डीजल—हर चीज के दाम तेजी से बढ़े हैं, लेकिन FRP में बढ़ोतरी उसी अनुपात में नहीं हुई. रणदिवे ने मांग की कि FRP को कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल किया जाना चाहिए.
सोलापुर जिले में रैयत क्रांति संगठन के अध्यक्ष नामदेव पवार ने FRP बढ़ोतरी को केवल दिखावा बताया. उनका कहना है कि सरकार कागजों में जो रेट घोषित करती है, वह किसानों को व्यवहार में मिल ही नहीं पाता. पवार के अनुसार, एक टन गन्ने का रेट 3000 रुपये तय होता है, लेकिन मिलें अक्सर किसानों को सिर्फ 2500 रुपये देती हैं और बाकी 500 रुपये रोक लेती हैं. यह बकाया राशि महीनों तक नहीं मिलती या फिर कभी मिलती ही नहीं.
किसानों का कहना है कि भुगतान में देरी भी एक बड़ी समस्या है. नियम के मुताबिक गन्ने का भुगतान 14 दिनों के भीतर मिल जाना चाहिए, लेकिन हकीकत में किसानों को पैसे मिलने में 2 से 3 महीने लग जाते हैं. इससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है.
इसके अलावा, किसानों ने पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और ईरान युद्ध का असर भी गन्ना खेती पर पड़ने की आशंका जताई है. किसानों का कहना है कि भले ही अभी डीजल के दाम न बढ़े हों, लेकिन आने वाले दिनों में इसके महंगे होने की पूरी संभावना है. डीजल महंगा होने पर ट्रैक्टर और सिंचाई का खर्च बढ़ेगा, जिसका सीधा असर किसानों की कमाई पर पड़ेगा.
किसानों का यह भी कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव के चलते खादों की कीमतों में 40 से 50 फीसदी तक बढ़ोतरी हो चुकी है, जिससे खेती और ज्यादा महंगी हो गई है. ऐसे हालात में गन्ने के FRP में सिर्फ 10 रुपये की बढ़ोतरी किसानों के लिए बहुत बड़ी राहत नहीं मानी जा सकती.
कुल मिलाकर, किसान संगठनों की मांग साफ है—अगर सरकार वास्तव में किसानों की आय बढ़ाना चाहती है, तो गन्ने का FRP कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल करे और समय पर पूरा भुगतान सुनिश्चित कराए.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today