किसानों को धान की खेती से हटाने के लिए प्रति एकड़ दें 35 हजार रुपये, एक्सपर्ट ने दी राय

किसानों को धान की खेती से हटाने के लिए प्रति एकड़ दें 35 हजार रुपये, एक्सपर्ट ने दी राय

कृषि-खाद्य नीतियों को पुनः संरेखित करना' शीर्षक वाले इस पेपर में निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्तमान शासन व्यवस्था टिकाऊ नहीं है और इसके परिणामस्वरूप धान की खेती के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का दोहन होता है और उर्वरक सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा इन दो उत्तरी राज्यों के खाते में जाता है, क्योंकि जून में शुरू होने वाले खरीफ सीजन के दौरान इन राज्यों ने अपने समकक्षों की तुलना में अधिक उर्वरक का उपभोग किया.

Advertisement
किसानों को धान की खेती से हटाने के लिए प्रति एकड़ दें 35 हजार रुपये, एक्सपर्ट ने दी रायधान की खेती

धान की खेती में पानी की खपत को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. धान की रोपाई में पानी का बहुत खर्च होता है जिससे भूजल स्तर में गिरावट आती है. यही वजह है कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में इसे लेकर बड़ा जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है. केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक धान की खेती के बदले उन फसलों पर जोर दे रही हैं जिसमें पानी कम से कम लगे. इसी में एक्सपर्ट के एक समूह ने बताया है कि किसानों को धान की खेती से हटाने और अन्य फसलों की खेती अपनाने के लिए इंसेंटिव देने पर विचार किया जाना चाहिए. इसका तर्क दिया जा रहा है कि कोई किसान धान की खेती तभी छोड़ेगा जब उसे दूसरी फसल की तरफ शिफ्ट होने या दूसरी फसल की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. 

अर्थशास्त्रियों का सुझाव

इसी में अशोक गुलाटी के नेतृत्व में आईसीआरआईईआर के अर्थशास्त्रियों ने एक पत्र में सुझाव दिया गया है कि खरीफ सीजन के दौरान धान की बजाय दलहन, तिलहन, बाजरा और मक्का की खेती करने वाले किसानों को 35,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की सहायता दी जाए. यह भी कहा गया है कि किसानों से पांच वर्षों तक इन फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद की जाए.

एक्सपर्ट का कहना है कि अगर किसानों को इस तरह से प्रोत्साहन दिया जाए तो वे धान के बदले उन फसलों की ओर रुख करेंगे जिनमें पानी की खपत कम होती है.

अशोक गुलाटी ने दिया प्रस्ताव

पंजाब और हरियाणा में फसल विविधीकरण की जरूरत पर बात करते हुए अशोक गुलाटी ने प्रस्ताव दिया है कि लागत को राज्य और केंद्र के बीच 50:50 के रेशियो में बांटा जाना चाहिए. इसका अर्थ हुआ कि किसान को जो राशि दी जाएगी उसमें राज्य और केंद्र की हिस्सेदारी बराबर होनी चाहिए. गुलाटी के हवाले से एक अंग्रेजी अखबार ने लिखा है, "हरियाणा पहले से ही प्रति हेक्टेयर 17,500 रुपये दे रहा है और केंद्र को इसे दोगुना करने की जरूरत है. दिलचस्प बात यह है कि इसमें शायद ही कोई अतिरिक्त खर्च शामिल है. यह बिजली, नहर के पानी और उर्वरक सब्सिडी पर बचत है जिसे किसानों को अलग रूप में वापस देने की जरूरत है. यदि ऐसा किया जाता है, तो भारत पंजाब-हरियाणा के सबसे उपजाऊ मैदानों को बंजर बनाने से बचा सकता है,".

ये भी पढ़ें: Paddy Cultivation: बिहार में धान रोपनी की मजदूरी बढ़ी, 1600 रुपये प्रति बीघा तक पहुंचा रेट

फसलों के खरीद का दिया आश्वासन

यह प्रस्ताव पंजाब के किसान संगठनों को केंद्रीय मंत्रियों की एक टीम द्वारा एक पैकेज की पेशकश के कुछ महीने बाद आया है, जिसमें दालों, मक्का और तिलहन की खेती करने वाले किसानों को पांच साल तक सरकारी खरीद का आश्वासन दिया गया है. हालिया किसान आंदोलन के दौरान एमएसपी गारंटी का मुद्दा पुरजोरी से उछला है. इसमें किसान सरकार से एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि अभी वह पांच साल के लिए फसलों को निश्चित दाम पर खरीदने का आश्वासन दे रही है. हालांकि किसान संगठन सरकार के इस प्रस्ताव को नकार चुके हैं. इसी प्रस्ताव को अशोक गुलाटी और अन्य एक्सपर्ट ने अपने पत्र में सुझाव के रूप में बताया है. 

भूजल की समस्या बढ़ी

हाल में जारी एक रिसर्च पेपर में बताया गया है कि वर्तमान समय में जैसी खेती की जा रही है उसमें धान की रोपाई के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का इस्तेमाल होता है और उर्वरक सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा दो उत्तरी राज्यों हरियाणा-पंजाब के खाते में जाता है. हालिया खेती का पैटर्न बताता है कि खरीफ सीजन के दौरान इन राज्यों ने अपने साथ के राज्यों की तुलना में अधिक का प्रयोग किया.

 

POST A COMMENT