किसान देबा पधियामीओडिशा के मलकानगिरी जिले के दूरदराज के गांव तमासा से एक शानदार सफलता की कहानी सामने आई है. यहां के एक आदिवासी किसान ने दुनिया के सबसे महंगे आमों में से एक, विश्व-प्रसिद्ध जापानी 'मियाजाकी' आम की सफल खेती करके सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है. इस उपलब्धि ने किसान को बड़ी पहचान दिलाई है, लेकिन साथ ही इस कीमती फल की सुरक्षा और मार्केटिंग से जुड़ी कुछ परेशानियां भी सामने आई हैं.
किसान, देबा पधियामी ने लगभग चार साल की कड़ी मेहनत और इंतजार के बाद इन दुर्लभ मियाजाकी आमों की पैदावार लेने में कामयाबी पाई. बताया जाता है कि इस सफर की शुरुआत तब हुई, जब स्थानीय समाज-सेवक सरबा कुमार बिसोई भुवनेश्वर से आम के कुछ खास पौधे लेकर आए थे. चूंकि बिसोई के पास खेती के लिए उपयुक्त जमीन नहीं थी, इसलिए उन्होंने ये पौधे देबा पधियामी को दे दिए ताकि वह इन्हें अपने बाग में लगा सकें.
मलकानगिरी में मौसम की कई चुनौतियों के बावजूद, देबा ने इन पौधों की बहुत ही सावधानी से देखभाल करना जारी रखा. उनकी मेहनत इस मौसम में रंग लाई, जब पेड़ पर 17 बड़े मियाजाकी आम लगे, जिसने पूरे इलाके में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा.
मूल रूप से जापान में उगाया जाने वाला मियाजाकी आम, अपनी बेहतरीन क्वालिटी, मिठास और रूबी-जैसे लाल रंग के लिए दुनिया भर में मशहूर है. अंतरराष्ट्रीय लक्जरी फलों के बाजारों और नीलामियों में मियाजाकी आमों की कीमत 1.5 लाख रुपये से लेकर लगभग 3 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है, जो इन्हें दुनिया के सबसे महंगे फलों में से एक बनाती है.
हालांकि, जो फसल किसी सपने जैसी लग रही थी, वह अब इस आदिवासी किसान के लिए एक बड़ी चुनौती भी बन गई है. इन दुर्लभ और कीमती फलों की चोरी के डर से, देबा ने अपने बाग को एक कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में बदल दिया है. आम के पेड़ के चारों ओर बांस की एक घेराबंदी (बैरिकेड) लगा दी गई है ताकि भीड़ अंदर न आ सके. वहीं किसान खुद हफ्तों से खुले आसमान के नीचे एक चारपाई पर सो रहा है, ताकि वह दिन-रात अपने बाग की रखवाली कर सके.
सुरक्षा की चिंताओं के अलावा, किसान एक और बड़ी समस्या से भी जूझ रहा है—प्रीमियम बाजार और सप्लाई चेन तक पहुंच का अभाव. देबा ने माना कि स्थानीय इलाके में बहुत कम लोग ऐसे महंगे आम खरीद सकते हैं, और उन्हें इस बात का भी कोई खास अंदाज़ा नहीं है कि इन आमों को कैसे या कहां बेचा जाए. "मैं सरकार से गुजारिश करना चाहूंगा कि वे मेरी मदद करें कि मैं इन आमों को कैसे बेच पाऊं. यहां इतने महंगे फलों के लिए कोई ढंग का बाजार नहीं है. मुझे नहीं पता कि मैं उन खरीदारों से कैसे संपर्क करूं जो इन्हें ऊंची कीमतों पर खरीद सकें. मैं लगातार अपने बाग की रखवाली कर रहा हूं. हर दिन लोग इन आमों को देखने आते हैं और मुझे डर है कि कहीं कोई इन्हें चुरा न ले," फलों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए देबा ने कहा.
विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक ओर भारत में विदेशी फलों की खेती में लोगों की दिलचस्पी बढ़ने लगी है, वहीं दूरदराज के इलाकों में रहने वाले किसानों को अभी भी खास तरह की पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज, ब्रांडिंग, परिवहन के बुनियादी ढांचे और अमीर खरीदारों, आलीशान होटलों या निर्यात बाजारों तक पहुंचने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
देबा पधियामी ने अब बागवानी और कृषि विभागों से अपील की है कि वे ओडिशा में मियाजाकी आम जैसे कीमती फलों की खेती को बढ़ावा देने और उनकी मार्केटिंग में उनकी मदद करें. उनका मानना है कि अगर सरकार मदद करे, तो आदिवासी किसान विदेशी फलों की खेती करके अपनी आमदनी बढ़ाने के बेहतर मौके पा सकते हैं.
समाजसेवी सरबा कुमार बिसोई ने भी इस बात पर जोर दिया कि अगर सही तकनीकी सलाह, फलों को सुरक्षित रखने की सुविधाएं, ब्रांडिंग में मदद और निर्यात बाजार की सुविधा मिल जाए, तो कीमती फलों की खेती मलकानगिरी जैसे पिछड़े जिलों के आदिवासी किसानों की आर्थिक हालत को पूरी तरह बदल सकती है.
मलकानगिरी में यह बागवानी ऐसे समय में सामने आई है, जब ओडिशा धीरे-धीरे दुनिया भर के फलों के निर्यात बाजारों में अपनी पहचान बना रहा है. हाल के सालों में, इस राज्य के कीमती आम रोम, वेनिस, फ्रांस, बेल्जियम, डबलिन, दुबई और यूनाइटेड किंगडम जैसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचे हैं. हाल ही में, अंगुल जिले के कीमती आम इटली को निर्यात किए गए, जबकि दुबई और UK में निर्यात के बाद, ढेंकनाल के मशहूर 'आम्रपाली' आमों की लगभग दो टन खेप जर्मनी भेजी गई.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि देबा पधियामी की सफलता की कहानी ओडिशा के और भी किसानों को बागवानी में नए प्रयोग के लिए बढ़ावा दे सकती है, बशर्ते उन्हें खेती और मार्केटिंग से जुड़ी जरूरी सरकारी मदद उपलब्ध कराई जाए.(अजय कुमार नाथ का इनपुट)
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