मंडोरी गांव के प्रगतिशील किसान अशोक कुमार सिंहबुंदेलखंड का जनपद जालौन कभी मेंथा की खेती के लिए जाना जाता था. गांव-गांव में मेंथा की खुशबू और तेल निकालने वाली इकाइयों की गूंज सुनाई देती थी लेकिन आज यहां अब मेंथा का नामोनिशान नहीं है. गिरती कीमतों और बढ़ती लागत ने इस नकदी फसल को किसानों के लिए घाटे का सौदा बना दिया है.
मंडोरी गांव के प्रगतिशील किसान अशोक कुमार सिंह इसका जीवंत उदाहरण हैं. वे बड़े पैमाने पर मेंथा की खेती करते थे और तेल निकालने के लिए उन्होंने पंच मशीन भी स्थापित की थी. इन मशीनों की मदद से हर साल करीब 5,000 लीटर मेंथा तेल का उत्पादन होता था. लेकिन आज वही मशीनें सूनी पड़ी हैं और जंग खा रही हैं.
अशोक कुमार सिंह बताते हैं कि पहले मेंथा तेल का दाम 1500 रुपये प्रति लीटर तक मिल जाता था, जिससे उन्हें अच्छा लाभ होता था. लेकिन अब कीमत घटकर 900–1000 रुपये प्रति लीटर रह गई है.
इसी के साथ मजदूरी दरों में लगातार बढ़ोतरी हुई है. बढ़ती लागत और गिरते दाम के कारण खेती में मुनाफा नहीं बल्कि नुकसान होने लगा. यही कारण है कि उन्होंने मेंथा की खेती बंद कर दी. गांव के ही दूसरे किसानों का कहना है अगर भविष्य में मेंथा तेल के दाम बेहतर हुए तो हम फिर से इसकी खेती करने पर विचार करेंगे.
क्षेत्र के अशोक कुमार सिंह ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों ने मेंथा की खेती से दूरी बना ली है. जो फसल कभी किसानों की आय का सहारा थी, आज वही बाजार अस्थिरता के कारण खेतों से गायब हो चुकी है.
हालांकि, मेंथा से दूरी बनाने के बावजूद अशोक कुमार सिंह ने इसे पूरी तरह भुलाया नहीं. वे बताते हैं कि मेंथा की खेती से केवल तेल ही नहीं मिलता, बल्कि इसकी पराली (फसल अवशेष) खेत की उर्वरता बढ़ाने में बेहद उपयोगी होती है.
उन्होंने 22 एकड़ में अपना पूरा फार्म जैविक पद्धति से विकसित किया है. मेंथा की पराली और जैविक संसाधनों के उपयोग से उन्होंने अपने खेत की मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन स्तर 1.2% तक पहुंचा दिया है, जबकि जालौन क्षेत्र में यह औसतन 0.4% के आसपास है.
यह अंतर बताता है कि सही प्रबंधन और जैविक तरीकों से मिट्टी की सेहत को किस तरह बेहतर बनाया जा सकता है.
यह कहानी केवल एक किसान की नहीं, बल्कि उस चुनौती की भी है जिसका सामना नकदी फसलों पर निर्भर किसान कर रहे हैं. यदि बाजार में स्थिरता और उचित समर्थन मूल्य मिले, तो मेंथा जैसी फसलें फिर से किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.
जालौन में मेंथा की खुशबू फिलहाल भले ही कम हो गई हो, लेकिन उम्मीद अभी भी बाकी है.
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