पूसा की उन्नत गन्ना किस्में बढ़ाएंगी चीनी का उत्पादनबिहार में वर्षों से बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से चालू करने की कवायद तेज हो गई है, लेकिन इस पहल के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—आखिर गन्ना कहां से आएगा? मिलों के बंद होने के साथ ही राज्य में गन्ने की खेती लगभग खत्म हो गई थी, जिससे अब कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर चुनौती बनी हुई है.
दरअसल, जब चीनी मिलों पर ताले लगे तो किसानों ने धीरे-धीरे गन्ना खेती से दूरी बना ली. गन्ना एक ऐसी फसल है जिसमें लगातार मिलों से जुड़ाव जरूरी होता है. मिल बंद होते ही किसानों ने अन्य फसलों की ओर रुख कर लिया, जिससे यह परंपरागत खेती पूरी तरह चौपट हो गई. अब जबकि सरकार और निजी क्षेत्र मिलों को दोबारा चालू करने की दिशा में प्रयासरत हैं, तो साथ ही गन्ना उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर भी काम किया जा रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक गन्ने की पर्याप्त और बेहतर पैदावार नहीं होगी, तब तक चीनी उद्योग को फिर से खड़ा करना संभव नहीं होगा.
इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए राज्य में उन्नत गन्ना किस्मों के विकास और विस्तार पर जोर दिया जा रहा है. बिहार का पूसा संस्थान इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा रहा है. विश्वविद्यालय में चीनी मिलों की भविष्य की मांग को ध्यान में रखते हुए कई नई गन्ना किस्मों पर रिसर्च जारी है. पूसा से अब तक पांच उन्नत किस्में जारी की जा चुकी हैं, जबकि कुछ नई किस्मों को जल्द ही अधिसूचित (नोटिफाई) किया जाएगा. इन किस्मों की विशेषता यह है कि ये अधिक उत्पादन देने के साथ-साथ स्थानीय जलवायु के अनुकूल भी होंगी.
पूसा गन्ना अनुसंधान संस्थान (समस्तीपुर, बिहार) के वर्तमान निदेशक डॉ. डीके सिंह ने 'किसान तक' से कहा कि चीनी मिलों के लिए गन्ने की आपूर्ति में कोई अड़चन नहीं आएगी क्योंकि अभी से तमाम तैयारियां तेज हैं. उन्होंने बताया कि बिहार में गन्ने की खेती अभी से बढ़ाई जा रही है ताकि चीनी मिलों के खुलने तक इसकी आपूर्ति सुनिश्चित हो जाए. डीके सिंह ने कहा, बिहार में चीनी मिलों के लिए गन्ना उत्पादन बढ़ाने में पूसा बड़ा रोल निभाएगा. इसकी तैयारी अभी से जारी है. संस्थान ने गन्ने की 5 उन्नत किस्में जारी की हैं और कुछ अभी पाइपलाइन में हैं. राजेंद्र गन्ना-5 और राजेंद्र गन्ना-2 जारी हो गई हैं. इसी तरह, राजेंद्र गन्ना-3 और राजेंद्र गन्ना-8 रिलीज हो गई हैं, लेकिन नोटिफाई होना बाकी है.
कुछ और उन्नत किस्मों की बात करें तो पूसा ने राजेंद्र गन्ना-6 और राजेंद्र गन्ना-7 को जारी कर दिया है, लेकिन अगले साल बिहार की स्टेट कमेटी रिलीज की घोषणा करेगी. इन सभी वैरायटी में राजेंद्र गन्ना-5 सबसे उन्नत है क्योंकि इसमें चीनी की मात्रा सबसे ज्यादा है. यह गन्ने की सभी किस्मों में सबसे अधिक लोकप्रिय है और अब तक जितनी भी वैरायटी जारी हुई है, उसमें सबसे उन्नत भी. यह किस्म रोगरोधी है जिसमें लाल सड़न जैसी बीमारी भी नहीं लगती. इस लिहाज से बिहार के किसानों के लिए राजेंद्र गन्ना-5 सबसे लाभकारी किस्म साबित होने वाली है.
बिहार में कई साल से बंद पड़ी चीनी मिलें एक साथ खुलेंगी तो इतनी अधिक मात्रा में गन्ने की आपूर्ति कैसे होगी? इसके जवाब में डीके सिंह ने कहा, सरकार के साथ पूसा जैसे संस्थान भी इस तैयारी में लगे हैं कि मिलों को गन्ने की कोई कमी ना हो. इसके लिए पूसा ने स्टेट वैरायटल ट्रायल शुरू किया है. इस ट्रायल का मकसद अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों को जारी करना और किसानों के बीच ले जाना है. ऐसा देखा जाता है कि गन्ने की कुछ वैरायटी बहुत अच्छी हैं, लेकिन किसी कारणवश पाइपलाइन में फंसी हैं. ऐसी किस्मों को तुरंत जारी करने के लिए ट्रायल का काम शुरू किया गया है.
यह अभियान पूरे प्रदेश में चल रहा है. इसकी जिम्मेदारी पूसा को मिली है जिसके तहत 5 जिलों में उन्नत किस्मों का ट्रायल शुरू किया जाएगा. इस दौरान दो साल का डेटा जुटाया जाएगा और देखा जाएगा कि किस जिले में कौन सी किस्म अधिक पैदावार दे सकती है. इस ट्रायल का मकसद गन्ने की वैरायटी में विविधता लाना और किसानों के बीच ले जाना है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन उन्नत वैरायटी को बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचाया जाए, तो राज्य में गन्ना उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है. इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि चीनी मिलों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति भी सुनिश्चित हो सकेगी. राज्य सरकार भी इस दिशा में सक्रियता दिखा रही है और दूसरी राज्यों से बेहतर गन्ना किस्मों को बिहार लाने की तैयारी चल रही है. इसका मकसद यह है कि किसानों को ऐसी फसल मिले जो कम लागत में अधिक उत्पादन दे सके और मिलों को भी लगातार आपूर्ति मिलती रहे.
इस दिशा में बिहार सरकार ने कई मोर्चों पर एक साथ काम शुरू किया है. चीनी मिलों और गैर चीनी मिलों, दोनों इलाकों में गन्ने की खेती बढ़ाई जा रही है. इसके लिए बीजों को अभी से तैयार किया जा रहा है ताकि मिलों के शुरू होने तक गन्ने की आपूर्ति पूरी तरह से सुचारू बन सके. कुल मिलाकर, बिहार में चीनी उद्योग को दोबारा जीवन देने की राह गन्ने की खेती से होकर गुजरती है. अगर उन्नत किस्मों के जरिए उत्पादन बढ़ाने की रणनीति कामयाब होती है, तो राज्य एक बार फिर देश के चीनी मानचित्र पर अपनी मजबूत पहचान बना सकता है.
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