केरल से फिर चमकेगी कोचिन अदरक और अल्लेप्पी हल्दीकेरल कृषि विश्वविद्यालय (KAU) ने हाल ही में एक सेमिनार आयोजित कर दो खास और पुरानी मसाला किस्मों-कोचिन अदरक और अल्लेप्पी फिंगर हल्दी-को फिर से शुरू करने की घोषणा की. ये दोनों मसाले कई सौ सालों से केरल से विदेशों में भेजे जाते रहे हैं. 19वीं सदी में भी इनका नाम और गुणवत्ता लिखित रूप में दर्ज किया गया था. इनकी खुशबू, रंग और स्वाद इन्हें दूसरे मसालों से अलग बनाते हैं. इसी कारण विदेशों में इनकी बहुत मांग रही है.
पिछले कुछ सालों में इन पारंपरिक किस्मों की खेती कम हो गई थी. इसका एक बड़ा कारण यह था कि किसान ज्यादा पैदावार देने वाली नई किस्में उगाने लगे. ये नई किस्में आकार में बड़ी होती हैं और घरेलू बाजार में जल्दी बिक जाती हैं. लेकिन धीरे-धीरे अलग-अलग किस्मों को मिलाकर खेती करने से असली कोचिन अदरक और अल्लेप्पी हल्दी की पहचान कमजोर पड़ गई. इससे इनकी खास गुणवत्ता भी कम हो गई और निर्यात बाजार पर असर पड़ा.
इन पारंपरिक मसालों को फिर से लोकप्रिय बनाने के लिए केरल कृषि विश्वविद्यालय ने एक विशेष परियोजना शुरू की है. यह परियोजना “कोचिन अदरक और अल्लेप्पी फिंगर हल्दी का पुनरुद्धार और निर्यात बढ़ावा” नाम से चलाई जा रही है. यह काम 2022 से 2026 तक चलेगा. इस परियोजना के तहत असली और शुद्ध किस्मों की पहचान की जाएगी, उन्हें अलग से उगाया जाएगा और फिर बड़े स्तर पर खेती के लिए किसानों को दिया जाएगा.
इस परियोजना के मुख्य वैज्ञानिक सुनील अप्पुकुट्टन नायर ने बताया कि इन मसालों का उत्पादन बढ़ने से किसानों को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा. इन मसालों की मांग मिडिल ईस्ट, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में बहुत ज्यादा है. अगर किसान सही किस्म उगाएंगे तो उन्हें बेहतर दाम मिल सकते हैं. विश्वविद्यालय ऐसे किसान समूहों और निर्यातकों की पहचान करेगा जो बड़े स्तर पर इनकी खेती करना चाहते हैं. किसानों को शुरुआत के लिए बीज किट भी दी जाएगी.
वर्ल्ड स्पाइस ऑर्गनाइजेशन (WSO) के अध्यक्ष रामकुमार मेनन ने बताया कि हर साल लगभग 20,000 टन सूखी कोचिन अदरक की मांग है. इसका मतलब है कि करीब एक लाख टन ताजी अदरक की जरूरत होती है. इसी तरह अल्लेप्पी जैसी उच्च करक्यूमिन वाली हल्दी की मांग करीब 50,000 टन है. करक्यूमिन हल्दी का वह तत्व है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है. आजकल दवा और न्यूट्रास्यूटिकल कंपनियां भी इन मसालों में रुचि ले रही हैं. इसलिए आने वाले समय में इनकी मांग और बढ़ सकती है. लेकिन अभी अच्छी गुणवत्ता की सप्लाई कम है.
ऑल इंडिया स्पाइसेज एक्सपोर्टर्स फोरम और वर्ल्ड स्पाइस ऑर्गनाइजेशन ने कृषि मंत्रालय और स्पाइस बोर्ड से इस बारे में बात की थी. उन्होंने चिंता जताई कि असली और शुद्ध किस्में बाजार में कम हो रही हैं. इसके बाद यह खास परियोजना शुरू की गई ताकि सही किस्मों को पहचाना जाए, उन्हें शुद्ध किया जाए और फिर बड़े पैमाने पर उगाया जाए.
यह नई पहल किसानों को पारंपरिक खेती से हटकर निर्यात पर आधारित खेती की ओर ले जाएगी. इससे किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों को पूरा कर पाएंगे और अच्छी कीमत भी पाएंगे. कोचिन अदरक और अल्लेप्पी फिंगर हल्दी फिर से दुनिया में अपनी खास पहचान बना सकेंगी. इस तरह केरल कृषि विश्वविद्यालय का यह कदम न केवल मसालों की पुरानी पहचान को बचाएगा, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद करेगा. आने वाले समय में ये मसाले फिर से भारत का नाम रोशन कर सकते हैं.
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