Ground Report: कश्मीर के ‘लाल सोने’ पर साही का कहर, केसर खेती अस्तित्व के संकट में

Ground Report: कश्मीर के ‘लाल सोने’ पर साही का कहर, केसर खेती अस्तित्व के संकट में

कश्मीर के पंपोर इलाके में केसर की खेती चूहों और साही के हमलों से बुरी तरह प्रभावित है. किसानों ने सरकार से ठोस नीति और वैज्ञानिक समाधान की मांग की है.

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Ground Report: कश्मीर के ‘लाल सोने’ पर साही का कहर, केसर खेती अस्तित्व के संकट मेंकश्मीर में केसर की खेती संकट में

कश्मीर का 'लाल सोना' (केसर) आज अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है. यह संकट जलवायु या बाजार के उतार-चढ़ाव जैसे आम कारणों से नहीं, बल्कि 'इंडियन क्रेस्टेड साही (एक तरह का चूहा)' (Indian Crested Porcupine) के कारण पैदा हुआ है.

पहले किसानों को सिर्फ बारिश की चिंता सताती थी. लेकिन अब उन्हें रात भर टॉर्च लेकर पहरा देना पड़ता है, क्योंकि साही झुंड बनाकर आते हैं. वे सिर्फ केसर के फूल ही नहीं खाते, बल्कि जमीन खोदकर उसके 'बल्ब' (गांठों) को भी खा जाते हैं. एक बार अगर बल्ब खत्म हो गया, तो उस जमीन पर अगले कई सालों तक केसर की फसल नहीं उग पाती.

संघर्ष में केसर की खेती

कश्मीर का केसर उद्योग पहले से ही कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है—चाहे वह बारिश की कमी हो, या फिर बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव (खासकर भारतीय बाजारों में ईरानी केसर की भरमार के कारण). लेकिन अब साही का यह नया खतरा किसानों की मुश्किलों में एक और नई चुनौती बनकर जुड़ गया है.

पिछले 10 से 15 सालों में, इन सभी समस्याओं के चलते केसर के उत्पादन में भारी गिरावट आई है. जहां पहले 20,000 किलो केसर पैदा होता था, वहीं आज यह घटकर महज 1,000 से 1,500 किलो रह गया है. अब किसानों ने सरकार से गुहार लगाई है कि वह इस मामले में दखल दे—खासकर वन्यजीव विभाग की मदद से—ताकि इन साही को किसी तरह पकड़कर वापस उनके प्राकृतिक वन-क्षेत्रों में छोड़ा जा सके.

पंपोर में जाफरान की खेती

कश्मीर के पंपोर को  पूरी घाटी का 'सैफ्रन टाउन' माना जाता है, लेकिन केसर का यह शहर बड़ी चुनौती से जूझ रहा है. कभी मौसम की मार तो कभी चूहों से परेशानी. सोने की तरह महंगी इस फसल पर साही का बड़ा हमला हो रहा है जिसकी जड़ों को वे कुरेद कर खा रहे हैं. इससे पूरी फसल सूख जाती है और खेतों में सूखे पौधों के अलावा कुछ नहीं बचता.

स्थानीय किसान सईद सनाउल्ला ने बताया कि इस साल 'Porcupine' (साही) नामक जानवर ने केसर के खेतों को भारी नुकसान पहुंचाया है. उनके अनुसार, नवंबर से मई तक सक्रिय रहने वाले ये जानवर और चूहे केसर के बीजों को खोदकर खा जाते हैं, जिससे फसल पूरी तरह बर्बाद हो रही है. एक अन्य किसान इरशाद अहमद डार ने इसे भारत की 'हेरिटेज क्रॉप' बताते हुए कहा कि सिंचाई की कमी और इन रोडेंट्स (Rodents) की वजह से करीब 1600 परिवार संकट में हैं. 

सीएम, पीएम से अपील

किसानों ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल से गुहार लगाई है कि वाइल्डलाइफ और कृषि विभाग मिलकर कोई वैज्ञानिक समाधान निकालें. उन्होंने नेशनल केसर मिशन के तहत अधूरे पड़े सिंचाई कार्यों को भी पूरा करने की मांग की है ताकि युवाओं का रोजगार बचा रहे और केसर की विश्व प्रसिद्ध पहचान खत्म न हो.

सनाउल्ला ने बताया कि वह पंपोर इलाके के रहने वाले हैं और इस समय 10–15 कनाल जमीन पर केसर की खेती कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस साल साही और चूहों ने बड़े पैमाने पर केसर की फसल को नुकसान पहुंचाया है. “केसर की घास के नीचे छुपे बीजों को ये जानवर निकाल लेते हैं, जिससे उत्पादन लगातार घट रहा है. दिन-ब-दिन बीज कम होते जा रहे हैं और हमारी पूरी मेहनत बेकार जा रही है,” उन्होंने कहा.

कश्मीर की विरासत

किसानों के मुताबिक, केसर एक बहुमूल्य और देश की विरासत (Heritage Crop) है, जिस पर पंपोर क्षेत्र की करीब 1600 से अधिक परिवारों की रोजी-रोटी निर्भर है. बावजूद इसके, सरकार और संबंधित विभागों की ओर से अब तक कोई प्रभावी समाधान नजर नहीं आया है. किसान इरशाद अहमद डार ने कहा कि चूहों, साही और कभी-कभी जंगली भालुओं के अलावा सिंचाई की सुविधाओं की कमी भी बड़ी समस्या है.

“केसर भारत की शान है, लेकिन आज हालत यह है कि खेत तो खाली दिखते हैं, पर मेहनत का फल नहीं मिलता. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले एक-दो साल में केसर की खेती इतिहास बनकर रह जाएगी,” उन्होंने चेतावनी दी.

किसानों ने यह भी याद दिलाया कि पहले नेशनल सैफ्रन मिशन के तहत कुछ सुधार जरूर हुए थे, लेकिन सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाएं आज तक पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराई गईं. उनका कहना है कि अगर केसर की खेती को बचाना है और युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना है, तो सरकार को तुरंत ठोस नीति और जमीनी स्तर पर मदद देनी होगी.(मीर फरीद की रिपोर्ट)

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