आलू की नई किस्मों से बंपर उत्पादन ले सकते हैं किसानरबीनामा: आलू को सब्ज़ियों का राजा यूं हीं नहीं कहा जाता है. चाहे दूसरी सब्ज़ी कोई भी हो, आलू का साथ मिलते ही उसमें दम आ जाता है. आलू अकेला भी कई बार सारी सब्जियों पर भारी पड़ता है. इसके अलावा पकौड़ी, चाट, पापड़ चिप्स और आलू से बनी भुजिया का तो कोई जवाब ही नहीं. बड़े पैमाने पर पैकेज्ड फूड के तौर पर भी ये इस्तेमाल हो रहा है. इसलिए इसकी डिमांड लगातार बढ़ रही है. अपने देश में लगभग 23 लाख हेक्टेयर में आलू की खेती की जाती है. हर साल लगभग 550 लाख टन से अधिक आलू का उत्पादन किया जाता है. आलू के विकास के लिए केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) ने सात दशकों में आलू की विभिन्न जलवायु परिस्थिति केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने सात दशकों में आलू की 65 किस्मों को विकसित किया है, जिसमें पीले और सफेद रंग की नई किस्में शामिल हैं. ये किस्में बेहतर उत्पादन देती हैं .रबीनामा सीरीज में जानेंगे आलू की इन पांच नई किस्मों के बारे में...
अक्टूबर माह में किसान आलू की बुआई शुरू कर देते हैं, कई बार महंगा बीज-खाद लगाने के बाद भी उन्हें थोड़ी सी लापरवाही से नुकसान उठाना पड़ता है. इसमें पहले विकसित की गई आलू की किस्मों में आलू के पिछेती झुलसा रोग के कारण बड़े पैमाने पर फसल बर्बाद होती है और भंडारण के समय आलू का सड़ना किसानों के लिए एक प्रमुख समस्या का कारण होता है. केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला ने पीले और सफेद आलू की किस्में विकसित की हैं. इन किस्मों से अधिक पैदावार होगी और पिछेती झुलसा रोग और आलू सड़न की समस्या कम होगी. आलू की ये पांच नई किस्में हर तरह से बहुत फायदेमंद हैं.
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भारत के मैदानी इलाकों के लिए कुफरी पुष्कर अच्छी गुणवत्ता वाली मध्यम अवधि की किस्म है. इस किस्म के आलू पीले रंग के, अंडाकार और मध्यम आकार के होते हैं. यह किस्म लगभग 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है. इसकी उपज क्षमता प्रति एकड़ 120 से 140 प्रति क्विंटल है. यह पिछेती झुलसा रोग प्रतिरोधी और अधिक समय तक भंडारण क्षमता वाली किस्म है. इस किस्म को CPRI शिमला द्वारा 2005 में जारी किया गया था.
कुफरी सदाबहार मध्यम अवधि में अधिक उपज देने वाली आलू की किस्म है. यह किस्म 2008 में CPRI शिमला द्वारा विकसित की गई थी. यह किस्म उत्तर प्रदेश और उसके आसपास के इलाके लिए काफी बेहतर है. आलू की यह किस्म हल्के सफेद, पीले रंग की अंडाकार होती है. यह किस्म 80 से 90 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी उपज क्षमता 120 से 140 क्विंटल प्रति एकड़ है. यह किस्म पिछेती झुलसा और अगेती झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी है. इसकी भंडारण क्षमता अधिक है. इसकी खेती करके कम समय में बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है.
कुफरी गरिमा एक अधिक उपज देने वाली आलू की किस्म है जो गंगा के मैदानी और पठारी क्षेत्रों में खेती के लिए बेहतर है. इस किस्म का आलू हल्के पीले रंग का आकर्षक होता है और इसका आकार अंडाकार होता है. यह किस्म बुवाई के 80 से 90 दिनों में खेत से खोदने के लिए तैयार हो जाती है. इसकी उपज 120 से 140 क्विंटल प्रति एकड़ है. यह किस्म 2012 में केंद्रीय आलू संस्थान, शिमला द्वारा जारी की गई थी. यह किस्म पिछेती झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी है. इस किस्म की भंडारण क्षमता भी अधिक होती है.
कुफरी गौरव आलू की किस्म मध्यम अवधि वाली है. यह बुवाई के 90 से 100 दिन में तैयार हो जाती है. इसकी औसत उपज 120 से 140 क्विंटल प्रति एकड़ है. इस किस्म का आलू बड़ा, चपटा, अंडाकार, सफेद छिलके वाला और मध्यम सफेद होता है. यह अच्छी भंडारण क्षमता वाली किस्म है. यह किस्म 2012 में CPRI शिमला द्वारा जारी की गई थी. ये किस्म पछेती झुलसा रोग के विरुद्ध एक रोग-रोधी किस्म है. इसकी भंडारण क्षमता भी अच्छी है.
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यह मध्यम अवधि में पकने वाली किस्म है. आलू की यह किस्म बुवाई के 90 से 100 दिन बाद तैयार हो जाती है. इस किस्म की उपज 140 से 160 क्विंटल प्रति एकड़ है. इसे CPRI, शिमला द्वारा 2016 में जारी किया गया था. इस किस्म की मुख्य विशेषता यह है कि इस पर पाले का प्रभाव नहीं पड़ता है. यह किस्म पिछेती झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है. इस किस्म की खेती उत्तर और पूर्व के मैदानी इलाकों में किसान कर सकते हैं और इस किस्म की खेती कर अधिक पैदावार लेकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.
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